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Ghaziabad News: सरकारी और प्राइवेट जमीन का अनुपात बिगड़ने से अटकी सनसिटी की संशोधित डीपीआर

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गाजियाबाद। एनएच-9 स्थित सनसिटी में सरकारी और प्राइवेट जमीन का अनुपात बिगड़ने से संशोधित डीपीआर की मंजूरी पर रोक लगी है। संशोधित डीपीआर की स्वीकृति पाने के लिए अब विकासकर्ता को अधिग्रहण और पुनग्रर्हण कराकर सरकार से ली गई 20 फीसदी जमीन लौटानी होगी, इसके साथ ही भू-उपयोग परिवर्तन शुल्क पर सीएजी ऑडिट में लगी आपत्ति का निस्तारण कराने के लिए 172 करोड़ रुपये भी चुकाने होंगे। जीडीए अधिकारियों का कहना है कि इन आपत्तियों को दूर करके अगर सनसिटी की ओर से संशोधित डीपीआर प्रस्तुत की जाएगी तो बोर्ड बैठक में दोबारा प्रस्ताव रखा जाएगा।
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जीडीए सचिव राजेश कुमार सिंह का कहना है कि सनसिटी के विकासकर्ता की ओर से वर्ष 2007 में 4312.99 एकड़ जमीन की डीपीआर पेश की गई थी। बिल्डर ने 717 एकड़ जमीन का नक्शा पास कर विकास शुरू कर दिया था। शासन की हाइटेक सिटी नीति के तहत 25 फीसदी जमीन सरकार को अधिग्रहण व पुनर्ग्रहण के माध्यम से बिल्डर को उपलब्ध करानी थी, बकाया 75 फीसदी जमीन विकासकर्ता को किसानों से खरीदनी थी। जीडीए ने 372 एकड़ जमीन अधिग्रहण व पुनर्ग्रहण के जरिए उपलब्ध करा दी है, लेकिन बिल्डर ने 75 फीसदी जमीन किसानों से नहीं खरीदी। अब बिल्डर की ओर से 827.99 एकड़ जमीन की संशोधित डीपीआर पेश कर दी, यानी बाकी जमीन अब बिल्डर नहीं खरीदेगा। ऐसे में डीपीआर की कुल 827.99 एकड़ जमीन के अनुपात में सरकारी जमीन का अनुपात 45 फीसदी हो गया है। यह हाईटेक नीति का उल्लंघन है। ऐसे में जीडीए बोर्ड ने सनसिटी की संशोधित डीपीआर का प्रस्ताव बैठक में निरस्त कर दिया है। जब तक मानकों के अनुसार बनाकर डीपीआर नहीं पेश की जाएगी, तब तक बोर्ड से इसे स्वीकृति नहीं मिल सकेगी।

वेव सिटी की डीपीआर स्वीकृति में ऑडिट आपत्ति का अड़ंगा
गाजियाबाद। वेवसिटी के दूसरे चरण की संशोधित डीपीआर मानकों के अनुरूप तो है, लेकिन इसमें सीएजी ऑडिट आपत्ति का अड़ंगा लग गया है। दरअसल, वेव सिटी के विकासकर्ता ने पूर्व में 4494 एकड़ जमीन पर टाउनशिप विकसित करने का प्रस्ताव दिया था। अब संशोधित डीपीआर का प्रस्ताव 4196 एकड़ जमीन की पेश की गई है। जीडीए सचिव का कहना है कि एक हजार एकड़ के भू-उपयोग परिवर्तन शुल्क के रूप में करीब 114 करोड़ रुपये बिल्डर की ओर से जमा कराए जा चुके हैं, लेकिन तकरीबन तीन हजार एकड़ से ज्यादा जमीन का शुल्क जमा नहीं कराया गया है। बिल्डर पर करीब 401 करोड़ रुपया बकाया है। इस पर सीएजी ने ऑडिट आपत्ति लगा दी थी। बिल्डर अगर इस रकम को जमा करा देगा तो संशोधित डीपीआर फिर से बोर्ड बैठक में प्रस्तुत की जाएगी।
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