चुनाव का नतीजा क्या रहा, यह तो 23 नवंबर को मतगणना के बाद ही पता चलेगा लेकिन सियासत से जुड़े लोगों के बीच एक ही सवाल है, भाजपा जीत की हैट्रिक लगाएगी या फिर सपा 20 साल पुराना इतिहास दोहराएगी। इसकी खास वजह है। यह क्षेत्र भाजपा का मजबूत किला रहा है जबकि सपा ने चाल ऐसी चली कि समीकरण उलझ गए।
सपा की ओर से चुनाव के दौरान यह अभियान चलाया गया कि लाइनपार क्षेत्र के पास अपना विधायक चुनने का मौका है। सपा उम्मीदवार सिंहराज जाटव इसी क्षेत्र के हैं। इसी क्षेत्र में 60 फीसदी से ज्यादा मतदाता हैं। यह क्षेत्र विकास की दौड़ में पिछड़ा हुआ बताया जाता है। यह चुनाव लाइनपार के मुद्दे पर ही सिमट गया था। भाजपा ने यहां पूरी ताकत लगाई। सीएम योगी का रोड शो तक कराया।
भाजपा और सपा ने पूरी ताकत झोंकी जबकि बसपा की ओर से प्रचार में बड़े नेता नहीं आए। हालांकि, बसपा उम्मीदवार पीएन गर्ग ने अपनी तरफ से पूरा प्रयास किया। सोशल मीडिया पर वह छाए रहे। लेकिन, बस्तों पर बसपा का जोर कम नजर आया। हालांकि, कई दलित बाहुल्य इलाकों में हाथी अपनी चाल चला। सपा ने दलित-मुस्लिम समीकरण बनाने की जो कोशिश की थी, वह पूरी तरह से कामयाब होती नहीं दिखी लेकिन दलित कार्ड चलने का फायदा मिलता जरूर नजर आया।
अकबरपुर-बरहामपुर में आधे से ज्यादा बूथों के बाहर बस्तों पर सिर्फ सपा और भाजपा के झंडे लगे थे। यहां डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने जनसभा की थी। विजयनगर में सपा कार्यकर्ता वोटरों को घर से लाकर बूथ तक पहुंचा रहे थे। भाजपा ने भी यहां वोटरों की सुविधा के लिए इंतजाम किए थे। दोनों के कार्यकर्ता सुबह से ही व्यस्त दिखे जबकि बसपा के बस्ते सूने नजर आए।
डू्ंडाहेड़ा, शिब्बनपुर और भीमनगर में साइिकल की रफ्तार तेज दिखी। क्रासिंग रिपब्लिक की सोसायटी से वोटर कम निकले लेकिन यहां कमल का फूल खिलता नजर आया। राकेश मार्ग, नेहरूनगर तृतीय और विवेकानंद नगर में भी भाजपा का जोर दिखा। कुल मिलाकर मुकाबले कांटे का है।
कैला भट्ठा में कम हुआ वोटों का बंटवारा
कैला भट्ठा सदर क्षेत्र में महत्वपूर्ण इलाका है। यहां आधे से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं। इनका रुख काफी अहम माना जाता है। इस इलाके के वोटरों पर सपा और बसपा दोनों की नजर लगी थी। लेकिन, वोटर दोनों में बराबर नहीं बंटे। कई मतदाताओं ने तो वोट डालने के बाद खुलकर कहा कि उन्होंने साइकिल चलाई है। चार महीने पहले लोकसभा चुनाव में यहां सपा-कांग्रेस गठबंधन की डाॅली शर्मा को काफी वोट मिले थे। उस चुनाव में कई बूथों पर बसपा उम्मीदवार 10 वोट भी हासिल नहीं कर सके थे।