विधानसभा चुनाव में भाजपा ने यूपी में ‘किला’ फतह किया है तो क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक जमीन खिसकी है। कभी वेस्ट यूपी में सबसे मजबूत पकड़ रखने वाले आरएलडी का किला इस बार पूरी तरह ढह गया।
गाजियाबाद, चौधरी चरण सिंह की कर्मभूमि व आरएलडी के गढ़ बागपत से लेकर हापुड़, बुलंदशहर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, मथुरा, बिजनौर समेत जाट बहुल क्षेत्र में भी इस बार छोटे चौधरी अजित सिंह और जयंत चौधरी का जादू नहीं चला। रालोद 2012 में जीती 9 सीटों को भी बचाकर नहीं रख पाया।
गाजियाबाद जिले में रालोद ने मुरादनगर विधानसभा क्षेत्र से जिलाध्यक्ष अजयपाल प्रमुख को, गाजियाबाद से निगम पार्षद सुल्तान खारी को, लोनी से पूर्व विधायक मदन भैया को और मोदी नगर से सिटिंग विधायक सुदेश शर्मा को मैदान में उतारा था।
बुलंदशहर से पूर्व विधायक श्रीभगवान शर्मा उर्फ गुड्डु पंडित को, शिकारपुर से पूर्व विधायक मुकेश शर्मा को, बड़ौत विधानसभा से पूर्व विधायक साहब सिंह और बागपत से करतार सिंह भड़ाना जैसे बड़े चेहरों को उतारा था। बावजूद इसके इनमें से एक भी प्रत्याशी जीत न सका। रालोद के प्रत्याशी सम्मानजनक वोट भी न पा सके।
मोदीनगर से सिटिंग विधायक सुदेश शर्मा पिछड़कर चौथे नंबर पर चले गए। हालांकि छपरौली विधानसभा सीट के मतदाताओं ने रालोद का सम्मान बचा लिया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अब जनता ऐसे दलों से मुंह मोड़ रही है, जो सत्ता में रहकर विकास कार्य न करा सके।
वहीं लंबे समय बाद भाजपा को पूर्ण बहुमत देकर जनता से फिर से नया प्रयोग किया है। यही वजह है कि सभी क्षेत्रीय दलों का वोट भाजपा पर ट्रांसफर हुआ है। यूपी की जनता के जनादेश को मानते हुए हार को स्वीकार करते हैं। ऐसे परिणामों की उम्मीद नहीं थी। पार्टी को समीक्षा करनी होगी कि किसान-मजदूरों की लड़ाई लड़ने में क्या कमी रही।
पार्टी के परिणाम निराशाजनक है। जनता की लड़ाई लड़ने का तरीका बदलेंगे और हार के कारणों की समीक्षा कर उन पर मंथन किया जाएगा। - मुंशीराम, पूर्व सांसद व पश्चिमी उत्तर प्रदेश अध्यक्ष, रालोद