नई सरकार का गठन भी हो गया और नए स्वास्थ्य मंत्री भी आ गए लेकिन अभी तक सरकारी अस्पतालों की दशा ज्यों की त्यों बनी हुई है। पिछले पांच महीने से अस्पतालों में दवाएं खत्म हैं।
उधार पर काम चलाया जा रहा था लेकिन अब दवा कंपनियों ने भी उधार देने से इंकार कर दिया है। ऐसे में गर्मियों में मरीजों की बढ़ी संख्या से अस्पताल कैसे निपटेंगे, यह बड़ा सवाल है।
सरकारी अस्पतालों में दवाएं खत्म
पिछले कई महीनों से उधारी पर काम चलाने के बाद अब अस्पतालों में एंटीबायोटिक दवाएं पूरी तरह खत्म हो गई हैं। शासन द्वारा साल 2016 की तीसरी तिमाही के बाद बजट न मिलने के कारण अस्पताल में जीवन रक्षक दवाओं की भारी कमी हो गई है।
फिलहाल एमएमजी में करीब सभी एंटीबायोटिक दवाएं खत्म हो गई हैं, जिसमें बच्चों के सीरप से लेकर अस्थमा रोगियों के लिए दवाएं शामिल हैं। इसके अलावा ग्लूकोज, एंटी इन्फ्लेमेटरी दवाएं, आई ड्रॉप, हाई बीपी की दवा आदि सभी खत्म हैं। अब तो दवा कंपनियों ने भी उधार देने से इंकार कर दिया है। अब अस्पताल में आने वाले मरीजों को बाहर से दवा खरीदनी पड़ रही है।
एमएमजी के सीएमएस डॉ. जेके त्यागी और संयुक्त जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. दिनेश शर्मा ने बताया कि शासन को लगातार दवाओं के बजट के लिए रिमाइंडर भेजा जा रहा है।
एक्सरे प्लेट्स खत्म
दोनों अस्पतालों में पिछले दो महीने से बड़े एक्सरे नहीं हो रहे हैं। एक्सरे की बड़ी प्लेट और अन्य सामान न होने से हर रोज मरीजों को वापस लौटना पड़ रहा है। बड़े एक्सरे प्लेट्स न होने के कारण चेस्ट, स्पाइन और अबडोमन के एक्सरे नहीं हो पा रहे हैं।
रैबीज के इंजेक्शन खत्म
गर्मियों में जहां कुत्तों का आतंक बढ़ जाता है और अस्पतालों में कुत्ते को काटने के मरीज सबसे अधिक आते हैं वहां अब दोनों अस्पतालों में रैबीज के इंजेक्शन खत्म हैं। एमएमजी अस्पताल में जहां पिछले छह महीने से एंटी रैबीज इंजेक्शन खत्म हैं वहीं संयुक्त जिला अस्पताल में एक महीने से खत्म हैं।