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मेरा वोट, मेरी सरकार

Sun, 12 Feb 2017 01:11 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला /गाजियाबाद
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वोट - फोटो : अमर उजाला
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मतदान के महापर्व में गाजियाबाद ने बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी निभाई। वैलेंटाइन वीक में आई चुनावी बेला ने तो नई उमंग ही भर दी। अपनी सरकार चुनने के लिए उत्साह ऐसा कि सुबह से ही मतदान केंद्रों पर लाइनें लग गईं।
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पहली बार वोट डालने पहुंचे युवा हों या चूल्हा चौका छोड़कर वोट करने वाली महिलाएं, 80 साल की दादी अम्मा हों या 90 बरस के बाबा, सबने पहले मतदान किया फिर दूसरा काम किया। बच्चे भी पीछे नहीं रहे, अपने पैरेंट्स के साथ ग्रैंड पैरेंट्स को पोलिंग बूथ तक लेकर गए।

जज्बा देखिए कि 90 साल के बुजुर्गों को कंधे पर बिठाकर युवा वोट डलवाने लाए तो दिव्यांगों की मदद के लिए वालंटियर्स दौड़ लगाते दिखे। शाम होते-होते गाजियाबाद की पांचों विधान सभाओं के करीब 25 लाख मतदाताओं ने 53 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला कर दिया। परिणाम के लिए अब इंतजार कीजिए, मतपेटियों के खुलने का। तब तक चर्चा करिए, सोचिए, विचारिए- मतदाता इस बार बनेगा किसका भाग्य विधाता।
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इनके हौसले को सलाम कहिए

लोकतंत्र के सम्मान में बुजुर्ग भी पीछे नहीं रहे। बुढ़ापे में हाथ-पांव ने भले ही साथ देना बंद कर दिया हो, लेकिन मतदान के प्रति उनके उत्साह को कम नहीं कर पाए। जिस शिद्दत से वह युवा अवस्था में मतदान करते थे, वैसे ही शनिवार को भी वोट डालने पहुंचे। 

कविनगर के प्रतिष्ठा अपार्टमेंट निवासी साढ़े 92 साल के नवल किशोर मेहरोत्रा केडीबी स्कूल में बने बूथ पर वोट डालने पहुंचे। चलने में असमर्थ नवल किशोर परिजनों के साथ गाड़ी से मतदान केंद्र के बाहर पहुंचे, यहां से उन्हें व्हील चेयर पर बैठाकर बूथ तक ले जाया गया।

नवल किशोर ने बताया कि युवा अवस्था से अब तक एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि उन्होंने वोट न डाला हो। सेठ मुकुंदलाल इंटर कालेज में रेलवे से रिटायर 89 साल के अंबा लाल शर्मा भी वोट डालने पहुंचे। उम्र ज्यादा होने की वजह से वह चल पाने में असमर्थ थे, लेकिन बेटे और बूथ पर तैनात वालंटियर की मदद से वह बूथ तक पहुंचे। 

संजय नगर के रामकृष्ण इंस्टीट्यूट, होली चाइल्ड स्कूल में भी कई बुजुर्ग मतदाता परिजनों के साथ मतदान करने पहुंचे। वहीं दिव्यांगों और बीमार लोगों में भी उत्साह ऐसा था कि मतदान का दिन आया तो वह अपनी कमजोरी को भूल गए और वोट देने पहुंच गए।

उनका कहना था कि पांच साल में एक दिन ऐसा अवसर आता है कि जब वह अपनी पसंद का जनप्रतिनिधि या सरकार को चुन सके। इस दिन मतदान न करना ऐसा है, जैसे अपने प्रदेश को लावारिस छोड़ दिया हो।
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