समाना में राजकुमार तोमर का कहना था कि यह इलाका भाजपा का गढ़ रहा है। यहां विधायक भाजपा के हैं और क्षत्रिय समाज से ही हैं। इसलिए, पंचायतों का बहुत असर होने के आसार पहले से ही नहीं थे। सपनावत में जयवीर का कहना था कि ठाकुरों के गांव में दोनों तरह का रंग दिख रहा है। भाजपा के समर्थन का और विरोध का भी। उम्मीद थी कि लोग एकतरफा ही चलेंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
बसपा के बस्तों पर नजर आई भीड़
ठाकुर बाहुल्य कई गांवों में बसपा के बस्तों पर भी भीड़ नजर आई, जबकि कांग्रेस के बस्तों पर गिनती के लोग थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ठाकुर समाज का उम्मीदवार उतारने का बसपा को फायदा मिला। बसपा ने पंजाबी समाज के अंशय कालरा का टिकट काटकर क्षत्रिय समाज के नंद किशोर पुंडीर को उम्मीदवार बनाया था। कविनगर रामलीला मैदान की रैली में बसपा अध्यक्ष मायावती ने अपने भाषण में क्षत्रिय समाज को अपने पाले में करने का भरसक प्रयास भी किया था। उन्होंने क्षत्रिय पंचायतों में समाज के उम्मीदवार को वोट देने के फैसले पर आभार भी जताया था।
पिछड़ गए थे वीके सिंह
पिछले चुनाव में भाजपा से क्षत्रिय समाज के ही वीके सिंह उम्मीदवार थे। तब कोई पंचायत भी नहीं हुई थी लेकिन वह धौलाना विधानसभा क्षेत्र में पिछड़ गए थे। उन्हें सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के उम्मीदवार सुरेश बंसल से दस हजार कम वोट मिले थे। हालांकि, इसकी वजह गठबंधन के पक्ष में दलित और मुस्लिम समीकरण बन जाना था। इस इलाके में दलित और मुस्लिम बड़ी संख्या में है। इस बार दोनों का समीकरण बनता नजर नहीं आया। मुस्लिम बाहुल्य गांवों में कांग्रेस के बस्तों पर रौनक रही जबकि दलित बाहुल्य बूथों पर मतदाता बंटे नजर आए।