अंकित तिवारी
गाजियाबाद। जर्जर भवनों को लेकर जिले में आपदा प्रबंधन प्रणाली कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा प्रशासन और विभागों के बीच चल रहे पत्राचार से लगाया जा सकता है। एक तरफ जर्जर भवनों के साये में लोगों की जान सांसत में है, दूसरी तरफ जिम्मेदार महकमे पत्र-पत्र खेल रहे हैं। न लोगों की जान की परवाह दिख रही है और न नियम-कायदों की। प्रशासन तीन महीने में चार बार जर्जर भवनों की सूची मांग चुका है, लेकिन नगर निगम और गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) के पास अब तक न सूची है, न कार्रवाई का हिसाब। आपदा प्रबंधन अधिनियम में जोखिम वाले भवनों की पहचान और प्रबंधन की जिम्मेदारी तय होने के बावजूद व्यवस्था कागजों से बाहर नहीं निकल सकी। नगर निगम पत्र मिलने से इनकार कर रहा है तो जीडीए पत्र देखकर जवाब देने की बात कह रहा है। अब मानसून बीतने के बाद नगर निगम ने जर्जर भवनों को चिह्नित करने के लिए कमेटी बनाई है।
प्रशासन : तीन महीने से मांग रहे सूची
एडीएम वित्त एवं आपदा प्रबंधन के नोडल अधिकारी अंजनी सिंह ने बताया कि जर्जर भवनों को लेकर 25 मई को जिलाधिकारी रविंद्र मांदड़ ने निर्माण से जुड़े विभागों को पत्र भेजकर जानकारी मांगी थी। जानकारी नहीं मिलने पर नौ जून को एडीएम वित्त की ओर से दोबारा पत्र भेजा गया। इसके बाद 29 जुलाई को भी जानकारी मांगी गई। अब सितंबर में फिर पत्र भेजा गया है। एडीएम वित्त का कहना है कि सूची मिलने के बाद भवनों को सुरक्षित करने और आवश्यक कार्रवाई की योजना बनाई जानी है। विभागों की ओर से जानकारी नहीं मिलने की सूचना जिलाधिकारी को दी गई है। साथ ही सोमवार को एक बार फिर संबंधित विभागों से सूची मांगी गई है।
नगर निगम : पत्र नहीं मिला, देखकर देंगे जवाब
नगर निगम के चीफ इंजीनियर एनके चौधरी ने कहा कि उन्हें प्रशासन की ओर से पत्र नहीं मिला है। पत्र मिलने के बाद उसे देखकर जवाब दिया जाएगा। इस बीच दिल्ली के पीजी में हुए हादसे के बाद नगर निगम ने जर्जर भवनों को चिह्नित करने के लिए कमेटी बनाई है। टीम मौके पर जाकर भवनों की स्थिति का आकलन करेगी और रिपोर्ट तैयार करेगी। इसके बाद भवनों को गिराने समेत अन्य कार्रवाई का निर्णय लिया जाएगा।
नगर आयुक्त ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि जिन भवनों की स्थिति ज्यादा खराब है, उनके मालिकों को तत्काल नोटिस जारी किए जाएं। उन्होंने कहा कि जर्जर भवनों से जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है। सुरक्षा मानकों से किसी भी स्थिति में समझौता नहीं किया जा सकता। अधिक जर्जर भवनों के मालिकों से भवन तत्काल खाली करने की अपील की जा रही है।
जीडीए : पत्र दिखवाएंगे, जल्द देंगे जवाब
जीडीए के चीफ इंजीनियर आलोक रंजन ने कहा कि पत्र को दिखवाया जाएगा। इसके बाद जल्द ही प्रशासन को जवाब भेज दिया जाएगा।
नियमों में जिम्मेदारी तय, जमीन पर कार्रवाई का इंतजार
प्रशासन की ओर से नौ जून को भेजे गए पत्र में आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 31 का हवाला देते हुए जिला आपदा प्रबंधन योजना में जोखिम वाले भवनों और क्षेत्रों की पहचान एवं प्रबंधन का प्रावधान बताया गया था। धारा 34 के तहत जिला प्रशासन को आवश्यक निर्णय लेने का अधिकार है, जबकि धारा 51 में निर्देशों का पालन नहीं करने पर कार्रवाई का प्रावधान है। इसके बावजूद तीन महीने से अधिक समय में जर्जर भवनों की सूची तक तैयार नहीं हो सकी। ऐसे में सवाल है कि जब जर्जर भवनों से खतरे की जानकारी पहले से थी तो मानसून से पहले कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या लोगों की सुरक्षा से जुड़े मामले में पत्राचार ही जिम्मेदार विभागों की पूरी कार्रवाई है?