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Ghaziabad News: अंकों की दौड़ में कहीं खो न जाए बचपन

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साहिबाबाद। गुलमोहर ग्रीन्स सोसायटी में छात्रा का शव आने पर लगी परिजनों और लोगों की भीड़। संवाद
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गाजियाबाद। एक बच्ची के लिए गणित के कुछ सवाल कितने भारी पड़ सकते हैं? साहिबाबाद के गुलमोहर अपार्टमेंट में सातवीं की छात्रा की मौत ने पढ़ाई के इस दबाव और बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा से जुड़े सवाल फिर सामने ला दिए हैं। पढ़ाई में कमजोर होना किसी बच्चे की पहचान नहीं हो सकता, लेकिन अंकों की दौड़, तुलना और अपेक्षाओं का दबाव कई बार उसके भीतर डर और चुप्पी पैदा कर देता है। बच्चा कब सवाल पूछना छोड़ देता है, कब स्कूल से घबराने लगता है और कब खुद को दूसरों से कम समझने लगता है, यह परिवार और स्कूल को कई बार पता ही नहीं चलता। ऐसे में सवाल सिर्फ एक स्कूल, एक शिक्षिका या एक परिवार का नहीं, बल्कि उस सोच का भी है, जिसमें बच्चे के भविष्य को अंकों की सूची से नापा जाने लगता है।
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एमएमजी अस्पताल के मनकक्ष की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. चंदा यादव का कहना है कि बच्चा गणित में कमजोर है तो उसे और गणित चाहिए, डर नहीं। उसे गलती सुधारने का मौका चाहिए, अपमान नहीं। उसे समझाने वाला शिक्षक चाहिए, लगातार तुलना करने वाला माहौल नहीं। इसके बावजूद स्कूलों में कई बार कमजोर विषय को लेकर बच्चों पर अपेक्षाओं का बोझ बढ़ता जाता है। कक्षा में पिछड़ने वाला बच्चा धीरे-धीरे सवाल पूछना बंद कर देता है और अचानक चुप रहने लगता है।
स्कूल जाने से घबराना, पढ़ाई से दूरी बनाना, लगातार उदास या चिड़चिड़ा रहना, नींद और खानपान में बदलाव, दोस्तों और परिवार से अलग रहना या बार-बार खुद को बेकार बताना ऐसे संकेत हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। सबसे जरूरी है कि बच्चे की बात बीच में काटे बिना सुनी जाए। यदि बच्चा जीवन खत्म करने, मरने या जीने की इच्छा न होने जैसी बात करता है तो उसे मजाक, जिद या ध्यान खींचने की कोशिश समझकर टालना खतरनाक हो सकता है। डॉ. चंदा ने बताया कि टेली-मानस की 14416 हेल्पलाइन पर 24 घंटे मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध है।
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हर बच्चे की प्रतिभा अलग, हतोत्साहित नहीं प्रोत्साहित करें
डॉ. चंदा का कहना है कि अभिभावकों की भूमिका भी यहीं से शुरू होती है। अच्छे अंक खुशी दे सकते हैं, लेकिन कम अंक बच्चे की असफलता का प्रमाण नहीं हैं। हर बच्चे की सीखने की गति अलग होती है। किसी की गणित अच्छी हो सकती है तो किसी की भाषा, खेल, कला या किसी दूसरी गतिविधि में रुचि और क्षमता अधिक हो सकती है। बच्चे को हर बार दूसरे बच्चों से आगे निकालने की कोशिश के साथ यह समझना भी जरूरी है कि वह भीतर से किस दबाव से गुजर रहा है। स्कूलों में भी पढ़ाई के साथ बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा को उतनी ही गंभीरता से लेना होगा। शिक्षक की डांट कब सामान्य अनुशासन से आगे बढ़कर बच्चे के लिए भय का कारण बन रही है, इसे पहचानने की व्यवस्था होनी चाहिए।

कम अंक छात्र का जीवन और भविष्य तय नहीं करते
वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ. संजीव त्यागी के अनुसार बच्चे को यह भरोसा मिलना जरूरी है कि किसी एक विषय में कमजोरी या कम अंक उसके पूरे जीवन और भविष्य को तय नहीं करते। समय पर बातचीत, परिवार का सहयोग और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद बच्चे को गंभीर मानसिक दबाव से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। बच्चों से सिर्फ यह पूछना काफी नहीं कि कितने नंबर आए। कभी यह भी पूछना होगा कि आज स्कूल में कैसा लगा, किस बात से डर लगा और क्या कोई ऐसी बात है, जो वह किसी से कह नहीं पा रहा।

साहिबाबाद। गुलमोहर ग्रीन्स सोसायटी में छात्रा का शव आने पर लगी परिजनों और लोगों की भीड़। संवाद

साहिबाबाद। गुलमोहर ग्रीन्स सोसायटी में छात्रा का शव आने पर लगी परिजनों और लोगों की भीड़। संवाद

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