शहर में एक ओर जहां मीट का अवैध कारोबार फल-फूल रहा है, वहीं चौंकाने वाली बात यह है कि गाजियाबाद में सिर्फ चार बूचड़खानों को ही प्रशासन की ओर से लाइसेंस मिला है।
अब प्रशासन ने अवैध बूचड़खानों के खिलाफ अभियान शुरू किया है तो इनके संचालकों में अफरा-तफरी मची हुई है। उधर डीएम निधि केसरवानी ने स्पष्ट किया है कि किसी भी हालत में बिना लाइसेंस मीट की दुकानों को संचालित नहीं होने दिया जाएगा।
अवैध बूचड़खानों के खिलाफ कार्रवाई की बात को भाजपा ने चुनाव से पहले ही अपने संकल्प पत्र में घोषित किया था। चार दिन पहले यूपी में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही मुख्यमंत्री महंत आदित्यनाथ ने बूचड़खानों पर शिकंजा कसने के आदेश जारी किए थे।
इसके बाद तत्काल ही प्रशासन हरकत में आ गया। शहर भर में अवैध बूचड़खानों के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई तो इस अवैध कारोबार से जुडे़ लोगों में हड़कंप मच गया। प्रशासन अपने अभियान के माध्यम से अब तक शहरी क्षेत्र में अवैध रूप से चल रहे 4 बूचड़खानों को बंद करा चुका है। इसके साथ ही लोनी में प्रशासनिक कार्रवाई के बाद 17 अवैध बूचड़खानों पर सील की कार्रवाई की गई।
डीएम निधि केसरवानी का कहना है कि कुछ मीट की दुकानों ने पूर्व में लाइसेंस लिया था मगर बाद में उन्होंने इसका नवीनीकरण नहीं कराया। ऐसे में वह भी अवैध की श्रेणी में आ गई हैं।
डीएम ने बताया कि सभी अधिकारियों को निर्देशित किया जा चुका है कि किसी भी हालत में एक भी अवैध बूचड़खाना और मीट की दुकान संचालित नहीं होने पाए। लाइसेंस भी सिर्फ उन्हीं को जारी किए जाएंगे, जोकि इसके नियम और मानकों को पूरा करते हों।
फूड डिपार्टमेंट से जारी नहीं हुआ मीट दुकानों का लाइसेंस
शहर में बिना लाइसेंस लिए मीट की दुकानें कई वर्षों से धड़ल्ले से चल रही हैं। दुकानों में बिकने वाले मांस की न तो कभी जांच हुई और न ही इनका कभी सैंपल लिए गए। डिपार्टमेंट के पास लोकल स्तर पर ऐसी कोई लैब नहीं हैं, जिसमें मीट की जांच हो सके।
ऐसे में यह भी पता नहीं चल पाता कि इन दुकानों पर किस जानवर का मांस बेचा जा रहा है। वह ताजा है या खराब, इसकी जांच ग्राहक नहीं कर पाते। फूड डिपार्टमेंट के डीओ अजय जायसवाल ने बताया कि मीट की दुकानों का लाइसेंस तभी मिलता है जब नगर निगम, पशुपालन विभाग व अन्य विभागाें से उसके लिए एनओसी मिल जाए। दुकानदार एनओसी लेते नहीं।
लिहाजा डिपार्टमेंट से अभी तक एक भी मीट की दुकान का लाइसेंस जारी नहीं हुआ है। इसलिए दुकानदारों ने कालोनियों के अंदर ही दुकानें खोल ली। दूसरी ओर यदि मीट का सैंपल लिया भी जाए तो उसके जांचने के उपकरण विभाग के पास नहीं है।