गाजियाबाद। हर्बल चिकित्सा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा दिया जाएगा। यह जानकारी पीसीआईएम एंड एच के निदेशक डॉ.रमन मोहन ने दी। वह आयुष मंत्रालय, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और भारतीय चिकित्सा एवं होम्योपैथी भेषज संहिता आयोग (पीसीआईएम एंड एच) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित तीन दिवसीय डब्ल्यूएचओ-हर्बल औषधियों के लिए अंतरराष्ट्रीय नियामक सहयोग (आईआरसीएच) कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। इसका शुक्रवार को समापन होगा।
कार्यशाला के दूसरे बृहस्पतिवार को इसकी शुरुआत विश्व के 14 देशों के प्रतिनिधियों की प्रस्तुतियों से हुई। भूटान, ब्रुनेई, ब्राजील, क्यूबा, मिस्र, घाना, इंडोनेशिया, नेपाल, जापान, पैराग्वे, पोलैंड, श्रीलंका और युगांडा के विशेषज्ञों ने अपने-अपने देशों में हर्बल औषधियों की प्रभावकारिता, उपयोग और नियमन की स्थिति पर विस्तृत जानकारी साझा की। इन प्रस्तुतियों ने वैश्विक स्तर पर पारंपरिक चिकित्सा की विविधता और चुनौतियों को उजागर किया।
कार्यशाला में डब्ल्यूएचओ-आईआरसीएच के अध्यक्ष डॉ. किम सुंगचोल ने डब्ल्यूएचओ पारंपरिक चिकित्सा रणनीति 2025-2034 पर व्याख्यान दिया। इसके बाद डॉ.तुलसी अधिकारी ने क्लीनिकल परीक्षणों के पंजीकरण पर डॉ.अरविंद चोपड़ा ने परीक्षणों में सर्वोत्तम अभ्यास पर और डॉ.रबी नारायण आचार्य ने हर्बल दवाओं में क्लीनिकल परीक्षणों की अनूठी भारतीय परिपाटी पर प्रकाश डाला।
फार्माकोविजिलेंस पर दो अहम व्याख्यान हुए। डब्ल्यूएचओ के डॉ.मधुर गुप्ता ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य साझा किया जबकि एआईआईए, नई दिल्ली के डॉ.गालिब ने आयुष आधारित फार्माकोविजिलेंस की भारतीय दृष्टि को रेखांकित किया। तकनीकी सत्रों के बाद प्रतिभागियों ने राष्ट्रीय यूनानी चिकित्सा संस्थान और पीसीआईएम एंड एच के हर्बल उद्यानों का दौरा किया। इस भ्रमण का उद्देश्य भारत की एकीकृत स्वास्थ्य प्रणाली की जमीनी समझ देना था। कार्यशाला में हर्बल औषधियों की वैश्विक स्थिति, नियामक ढांचे और अनुसंधान के क्षेत्र में भारत की भूमिका को लेकर विशेषज्ञों ने अपनी राय बताई।