एंटीबायोटिक दवाओं का बेअसर होना बड़ी समस्या बनकर सामने आ रहा है। इसके खतरे को रोकने के लिए सेंट्रल ड्रग स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन और मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर ने सभी राज्यों को एंटीबायोटिक दवाओं के जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल के निर्देश दिए हैं।
विभाग ने सभी राज्यों के इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्यों सहित नर्सिंग, फार्मासिस्ट सभी से जागरूकता फैलाने की अपील की है। ।बेवजह एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन और एंटीबायोटिक कोर्स को बीच में छोड़ देने की वजह से दवाएं बेअसर हो रही हैं।
इन दवाओं के प्रति शरीर में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाने के कारण अन्य दवाएं बेअसर हो रही हैं, जिसकी वजह से मौतें हो रही हैं। इसकेलिए एच और एच-1 शेड्यूल की दवाओं सहित थर्ड और फोर्थ जेनरेशन की एंटीबायोटिक और एंटी-टीबी की दवाओं का कम से कम इस्तेमाल करने के निर्देश दिए गए हैं।
इसके लिए आईएम के चिकित्सकों, नर्सेस संघ, केमिस्ट ए़ंड ड्रगिस्ट और फार्मासिस्ट से यह अपील की गई है कि वह आम जनता और स्टाफ को ऑडियो विजुअल माध्यमों के जरिए जागरूक करें और स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट गाइड का पालन करें।
ये हैं खतरे
शेड्यूल-एच की दवाओं में अधिकतर मानसिक परेशानी, नींद, बेहोशी और गर्भपात से संबंधित होते हैं। इसमें से नींद आदि की दवा लोग बिना चिकित्सक की सलाह सेलेते हैं। अपने मन से इन दवाओं के सेवन करने से मानसिक संतुलन भी बिगड़ने का खतरा रहता है। इसके अलावा किडनी, लीवर आदि भी असर पड़ता है।
इनसेट:
- सिफेक्सीम, सिप्रोफ्लोक्सिन, एलप्राजोलाम , एमोक्सीसिलिन, एलपारेक्स, कोडीन, डायाजेपाम, आईब्रुफिन आदि दवाएं शामिल हैं।
कोट्स
आईएमए के सभी चिकित्सक इस गाइडलाइन का पालन करते हैं लेकिन जब तक क्वैक्स (अपंजीकृत चिकित्सक) पर लगाम नहीं लगेगी, खतरा बना रहेगा। -आईएमए अध्यक्ष, राजीव गोयल