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वेंटिलेटर के अभाव में रिटायर शिक्षक ने सड़क पर तोड़ा दम

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इलाज ना मिलने के कारण हो हुई सुर्जन सिंह की मौत। फाइल फोटो - फोटो : GHAZIABAD City
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वेंटिलेटर के अभाव में रिटायर शिक्षक ने सड़क पर तोड़ा दम
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साहिबाबाद। वेंटिलेटर के लिए दिल्ली में रहने वाले यशवीर सिंह अपने पिता को बाइक पर बैठाकर एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकते रहे लेकिन न तो पिता को बेड मिला और न ही ऑक्सीजन। भटकते भटकते ही वैशाली सेक्टर एक में इलाहाबाद बैंक के पास उनके पिता ने बाइक पर ही दम तोड़ दिया। वह करीब डेढ़ घंटे तक वहीं खड़े रहे लेकिन कोई भी मदद को आगे नहीं आया। इसकी जानकारी आसपास रहने वाले लोगों और पार्षद को मिली तो वह मौके पर पहुंचे और एंबुलेंस कराकर दिल्ली भिजवाया। खास बात यह भी है कि इनके पिता की कोरोना रिपोर्ट निगेटिव आई थी, फिर भी अस्पतालों ने इन्हें पॉजिटिव कहकर इलाज नहीं किया। 65 वर्षीय पिता पांच साल पहलेे शिक्षा विभाग, दिल्ली से कर्मचारी पद से रिटायर हुए थे।
दिल्ली के विनोद नगर में रहने वाले यशवीर सिंह ने बताया कि उनके पिता सुर्जन सिंह बिष्ट की तबियत 25 मार्च को वैक्सीन की पहली डोज लेने के बाद बिगड़ने लगी थी। 14 अप्रैल से सांस लेने में परेशानी हो रही थी। 16 अप्रैल को दिल्ली के कड़कड़डूमा स्थित एक निजी अस्पताल में दिखाया तो उन्होंने अगले दिन कल्याणपुरी के एक अस्पताल में भेज दिया। इस अस्पताल ने चेस्ट में इंफेक्शन बताकर जीटीबी अस्पताल ले जाने को कहा। लगातार हालत गंभीर होने पर 18 अप्रैल की रात 12 बजे पिता को लेकर जीटीबी अस्पताल पहुंचे। वहां बमुश्किल कोरोना की जांच हुई तो रिपोर्ट निगेटिव आई। इस पर अस्पताल ने पिता की हालत को मामूली बताते हुए इलाज करने से मना कर दिया। जबकि पिता की हालत बिगड़ रही थी। ऐेसे में हार कर वहां से वहां से पिता को लेकर फिर कड़कड़डूमा स्थित अस्पताल पहुंचे तो अस्पताल ने कोविड का लक्षण बताकर इलाज करने से मना कर दिया। इसके बाद कल्याणपुरी स्थित अस्पताल में दोबारा से गए, वहां भी डॉक्टरों ने ऑक्सीजन न होने की बात कह कर भर्ती करने से मना कर दिया। यशबीर सिंह ने बताया कि 19 अप्रैल को करीब तीन बजे पिता को बाइक पर बैठाकर कौशांबी स्थित एक निजी अस्पताल में पहुंचा। यहां पिता ने अपनी हालत को लेकर डॉक्टरों से काफी हाथ पैर जोडे़ तो उन्होंने करीब आधे घंटे तक ऑक्सीजन चढ़ाया। इसके बाद डॉक्टरों ने बेड न होने की बात कहकर दूसरे अस्पताल में ले जानेे को कहा। वहां से फिर वैशाली स्थित एक अस्पताल आए। यहां भी डॉक्टरों ने ऑक्सीजन व बेड न होने की बात कहकर इलाज करने से मना कर दिया जबकि वहां और मरीजों को ऑक्सीजन दिया जा रहा था। मेरे पिता ने इलाज के लिए डॉक्टरों से काफी गिड़गिड़ाया लेकिन उन्होंने एक न सुनी। हारकर पिता को फिर पिता को बाइक पर बिठाया और शाम करीब पांच बजे वैशाली केे दूसरे अस्पताल की खोज करने लगे। मैंने पिता से कहा था कि आप मुझे पीछे से पकडे़ रहें। वैशाली सेक्टर 1 नाले के सामने इलाहाबाद बैंक के पास पिता की पकड़ ढीली हो गई। मुड़कर देखा तो पिता मूर्छित हो गए थे। मैंने बाइक रोकी, तब तक पिता दम तोड़ चुके थे। जिसके बाद उन्होंनेे आसपास लोगों से मदद मांगी लेकिन सब ने कोराना मरीज समझकर कोई मदद नहीं की। करीब डेढ़ घंटे तक वहीं बैठे रहे। इसके बाद पार्षद मनोज गोयल पहुंचे और उन्होंने एंबुलेंस से घर भिजवाया। मंगलवार को कोंडली स्थित श्मशान घाट पर पिता का अंतिम संस्कार किया।
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पार्षद ने की मदद
पार्षद मनोज गोयल ने बताया कि वह शाम करीब साढे़ पांच बजे इंदिरापुरम में थे। वहां उन्हें किसी ने बताया कि एक व्यक्ति का शव वैशाली में पड़ा है और कोई उसकी मदद नहीं कर रहा है। इस सूचना पर वह वहां पहुंचे तो रोड पर रखे पिता के शव के पास बैठकर बेटा रो रहा था। फिर उन्होंने एंबुलेंस की व्यवस्था कर उन्हें दिल्ली विनोद नगर भिजवाया।
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घर की आर्थिक हालत है दयनीय
यशबीर सिंह ने बताया कि वह लोग पौडी गढ़वाल के विलेनी गांव के रहने वाले हैं। पांच साल पहले पिता शिक्षा विभाग से रिटायर हुए हैं। वह एक फार्मा कंपनी में काम करते थे। पिछले कोरोना में उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। वह फोटो कॉपी की एक छोटी दुकान चलाने लगे, वह भी बंद हो गया। पिता की मौत के बाद मां का रो रोकर बुरा हाल है।
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