खतरे की घंटी : गाजियाबाद में बीते चार साल में औसतन 12 मीटर नीचे खिसक गया भूजल स्तर
गाजियाबाद। भूजल का अंधाधुंध दोहन बंद नहीं किया गया तो पीने के लिए भी पानी नहीं मिलेगा। उत्तर प्रदेश भूगर्भ विभाग के आंकड़े इसकी तरफ ही इशारा कर रहे हैं। जिले में तेजी से हो रहे भूजल दोहन की वजह से इसका स्तर हर साल औसतन तीन मीटर नीचे खिसक रहा है। शहरी इलाकों में भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। प्रतिबंध के बावजूद शहर में न सिर्फ घरों में बल्कि उद्योगों में भी धड़ल्ले से सबमर्सिबल लगाकर अवैध रूप से पानी का दोहन किया जा रहा है।
भूगर्भ जल विभाग शहर में 39 स्थानों पर पीजोमीटर के जरिए भूजल स्तर की मॉनीटरिंग कर रहा है। हर साल मानसून से पहले और मानसून सीजन खत्म होने के बाद भूजल स्तर की रीडिंग ली जा रही है। विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार बीते चार साल में साहिबाबाद गांव क्षेत्र में पानी का स्तर 9.4 मीटर और अर्थला क्षेत्र में 9.22 मीटर नीचे खिसक गया है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में उद्योग और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हैं। शहर में सबसे ज्यादा खराब हालात नूरनगर, राजनगर एक्सटेंशन क्षेत्र के हैं। यहां भूजल स्तर सबसे नीचे 48.31 मीटर नीचे पहुंच गया है। साल 2016 में क्षेत्र में भूजल का स्तर 29.43 मीटर पर था। यानी इन चार साल में पानी का स्तर करीब 19 मीटर नीचे खिसक गया है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में ग्रुप हाउसिंग और कॉलोनियां विकसित हो रही हैं।
तालाब वाले इलाकों में गिरावट कम
शहर के उन इलाकों में भूजल स्तर में गिरावट बेहद कम आई है, जिनमें आसपास तालाब है और उद्योग नहीं है। इनमें दुहाई, सदरपुर, महरौली, शाहपुर बम्हेटा आदि गांव शामिल हैं। यहां आवासीय क्षेत्रों में जितना जलदोहन हो रहा है उससे 50 प्रतिशत तक रीचार्ज भी हो रहा है। इन क्षेत्रों में भूजल स्तर में औसतन सालाना गिरावट करीब 0.5 से लेकर 0.75 मीटर तक की गिरावट दर्ज की जा रही है। दूसरी ओर औद्योगिक या सघन आबादी वाले क्षेत्रों में 2.5 से 3 मीटर सालाना की गिरावट आ रही है।
पांच करोड़ रुपये खर्च करके शहर का सबसे बड़ा तालाब कर दिया बर्बाद
नगर निगम ने शहर के सबसे बड़े पक्के तालाब को सौंदर्यीकरण के नाम पर बर्बाद कर दिया। पूर्व महापौर दमयंती गोयल और तत्कालीन नगर आयुक्त बसंत लाल के कार्यकाल में इस तालाब को पिकनिक स्पॉट के रूप में विकसित करने की योजना पर काम शुरू किया गया था। निगम अधिकारियों का दावा था कि इसमें शहर की कई कॉलोनियों का पानी आएगा और चारों तरफ खूबसूरत लाइटें, बेंच लगाकर सुंदर बनाया जाएगा। नगर निगम ने इस तालाब के चारों तरफ ऊंची बाउंड्रीवॉल कर दी, इसकी वजह से अब वर्षा का पानी तालाब में पहुंच ही नहीं पाता है। पांच करोड़ रुपये खर्च कर सरकारी धन की बर्बादी भी की गई है।
हालात न बदले तो बूंद-बूंद को पड़ेगा तरसना
भूगर्भ जल विभाग असिस्टेंट इंजीनियर राहुल देव शर्मा का कहना है कि गाजियाबाद के कई क्षेत्रों में भूजल स्तर बहुत तेजी से गिर रहा है। सरकारी विभागों के साथ-साथ लोगों को भी भूजल स्तर बढ़ाने के संयुक्त प्रयास करने होंगे। इसके लिए बड़े घरों में भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग लगाए जाने चाहिए और पानी को रीयूज करने की व्यवस्था करनी चाहिए। प्राधिकरणों को सुनिश्चित कराना चाहिए कि नियमों के अनुसार 300 मीटर से बड़े भवनों में वर्षा जल संचयन सिस्टम विकसित किया गया हो। हालात नहीं बदले तो आने वाले वर्षों में लोगों को पानी की बूंद-बूंद को तरसना पड़ सकता है।
तालाब ही बचा सकते हैं गिरते भूजल स्तर को: सुशील राघव
पर्यावरण व जल संरक्षण के लिए काम करने वाले कड़कड़ मॉडल निवासी सुशील राघव का कहना है कि गिरते भूजल स्तर को सिर्फ तालाब ही बचा सकते हैं। पूर्व में नगर निगम सीमा क्षेत्र में 140 तालाब थे, इनमें से 100 से ज्यादा तालाबों पर कब्जे कर पाट दिया गया है। शहरी क्षेत्र में भूजल स्तर के गिरने का सबसे बड़ा कारण वाटर रिचार्ज न होना है। एनजीटी ने यूपी के मुख्य सचिव को प्रदेश भर के तालाबों को खाली कराकर उनका जीर्णोद्धार करने के आदेश दिए थे, लेकिन इस पर भी काम बहुत धीमी गति से किया जा रहा है।
जल संचयन सिस्टम लगाए जा रहे
शहर में तालाबों का जीर्णोद्धार कराया जा रहा है। कई तालाबों की सफाई करा दी गई है। जल्द ही शहर के करीब 100 पार्कों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम विकसित कराया जाएगा। इसके अलावा सार्वजनिक व सामुदायिक शौचालयों में भी वर्षा जल संचयन सिस्टम लगाए जा रहे हैं। - महेंद्र सिंह तंवर, नगरायुक्त