हिंसा के बाद यूपी गेट पर आंदोलन की बदलने लगी तस्वीर, लौटने लगे किसान
साहिबाबाद। ट्रैक्टर रैली के अगले दिन बुधवार को यूपी गेट पर किसान आंदोलन की तस्वीर काफी अलग थी। आंदोलन स्थल पर किसानों की संख्या काफी कम हो गई है। किसान वापस अपने घर जाते नजर आए। कुछ जगहों से किसानों ने अपने तंबू हटा लिए, घर जाने के लिए गद्दे रजाई समेटते दिखे। कुछ लंगर भी बंद हो गए। हालांकि अभी भी सैकडों की संख्या में किसान डटे हैं। कुछ किसानों का कहना है कि वह दिल्ली में हुई हिंसक घटना की निंदा करते हैं लेकिन बिल वापसी के बगैर घर वापसी नहीं करेंगे। वहीं मंच से बुधवार को भी आंदोलन को आगे रखने का आह्वान किया गया।
23 जनवरी से तो किसानों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ। यूपी गेट पर किसानों की संख्या 15 हजार के करीब पहुंच गई थी। यहीं नहीं लिंक रोड पर किसानों का दायरा दो किलोमीटर तक तो दिल्ली एक्सप्रेसवे पर करीब चार किलोमीटर तक फैल गया था। मंगलवार को ट्रैक्टर मार्च के दौरान दिल्ली में हुई हिंसा के बाद शाम से ही किसानों का वापस जाना शुरू हो गया था। ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर किसान अपने गांव जाने लगे।
किसानों का कहना है कि आंदोलन स्थल पर पांच सौ कैंप लगे थे। जिनमें से दो तीन दर्जन के करीब कैंप किसानों ने हटा लिए। बुधवार को लंगर भी खाली दिखे, लंगर पर भोजन तो पक रहा था लेकिन खाने वालों की संख्या बेहद ही कम थी। जूस और जलेबी के लंगर तो आंदोलन स्थल से हट गए थे। शाम को वीएम सिंह के आंदोलन से समर्थन वापस लेने के बाद तो एक्सप्रेस वे के ऊपर से किसानों का जाना शुरू हो गया।
दो मिनट का मौन रखने के बाद भूख हड़ताल पर बैठे
रैली में बाजपुर के युवा किसान की जान जाने के बाद यहां सुबह के समय किसानों ने दो मिनट का मौन रखकर उसके लिए शांति की प्रार्थना की। इसके बाद मंच का संचालन बंद हो गया। वहीं 11 किसान रोजाना की तरह सुबह आठ बजे से 24 घंटे की भूख हड़ताल पर बैठ गए। किसानों की संख्या घटने पर किसान नेता जगतार सिंह बाजवा ने दावा किया कि किसान बाजपुर में मृतक किसान को श्रद्धांजलि देने के लिए गए हुए हैं। अगले दो से तीन दिनों में यूपी गेट पर पहले की तरह ही किसानों की संख्या अधिक नजर आएगी। उधर, किसान अलग-अलग जगहों पर खड़े होकर दिल्ली में हुई घटना के बारे में चर्चा कर रहे थे। किसान इस घटना को बेहद शर्मनाक बताकर दुख जाहिर कर रहे थे।
आंदोलन के भविष्य को लेकर चिंता में किसान
बुधवार को कई किसान आंदोलन के भविष्य को लेकर चिंता में बैठे हुए थे। अमर उजाला से बातचीत के दौरान उत्तराखंड के गुरदयाल सिंह की आंखों से आंसू छलक गए। उनकी चिंता थी कि युवा किसान आज बड़े-बुजुर्गों की बातों को नहीं सुनते। इसी का फायदा उठाकर अराजक तत्वों ने आंदोलन का हिस्सा बनकर किसानों पर बड़ा दाग लगा दिया । लेकिन उनके हौसले पूरी तरह से मजबूत थे। उनका कहना था कि जब तक मांगे नहीं मानी जाएगी, आंदोलन खत्म नहीं होगा। इसी तरह पूर्व सैनिक भी यूपी गेट पर डटे हुए हैं। उन्होंने लालकिले की घटना के जिम्मेदार युवक को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की मांग की।