बच्ची के पिता सुबह ही कोर्ट पहुंच गए थे। फैसले के बाद उन्होंने कहा कि दरिंदों को सजा तो मिल गई लेकिन बच्ची का जीवन तो बर्बाद ही हो गया। उसका बचपन कैसे लौट सकता है? वह सातवीं कक्षा में पढ़ती थी। बच्चे को जन्म देने बाद से स्कूल नहीं गई। उसकी पढ़ाई छूट चुकी है। हर वक्त सहमी रहती है।
पिता ने कहा, हमें डर रहता है कि उस पर कोई हमला न कर दे। दोषी पाए गए युवकों के परिजन समझौते के लिए दबाव बनाते हैं। कभी भी घर में आ जाते हैं। वे जान से मारने की धमकी दे चुके हैं। इसकी शिकायत खोड़ा थाना में दर्ज कराएंगे।
फैसला आने के बाद बच्ची की मां कहा कि उन्हें दोषी युवकों को फांसी की सजा मिलने की उम्मीद थी। इसके लिए ही प्रार्थना की थी। हमारी फूल की बच्ची का जीवन बर्बाद हो गया है। यह पत्थर सी हो गई है। जो उसकी हालत देखता है और उसकी आपबीती सुनता है, उसके आंसू निकल आते हैं।
उन्होंने बताया कि वह सिर्फ इसलिए कोर्ट नहीं गईं क्योंकि डर था कि फैसला सुनकर बच्ची को कोई घबराहट न हो जाए। उसे संभालना जरूरी था। वह पूछ रही थी कि कोर्ट में आज क्या होगा?। उन्हें तसल्ली है कि फैसला आने में बहुत देरी नहीं हुई। विशेष लोक अभियोजक हरीश कु मार ने पैरवी में कोई कमी नहीं की।
मेरठ मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में बेटा पैदा होने के बाद बच्ची के परिजनों ने उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। बच्चा पैदा होने के बाद मां ने उसकी तरफ देखा भी नहीं था। मेरठ से आने के बाद प्रशासन की देखरेख में बच्चा अनाथालय में पल रहा है।