बाल आश्रमों में पल रहे मासूम बच्चों को जब अपनों की याद आती है तो उनके मासूम चेहरों पर आंसुआें की जैसे झड़ी लग जाती है। आश्रम में भी इनके साथ कैसा व्यवहार होता है, यह देखने वाले अधिकारी भी अपनी जिम्मेदारी भली प्रकार से नहीं निभा पा रहे।
गाजियाबाद में ऑपरेशन स्माइल चलाकर देश-विदेश में अपना परचम लहरा चुकी पुलिस के भी किसी अधिकारी को इतनी फुर्सत नहीं है कि इन मासूमों का हाल चाल ही पूछ लिया जाए। पिछले दिनों डीएम ने अचानक ही प्रेरणा परिवार बाल आश्रम का निरीक्षण किया तो वहां बदइंतजामी के हालात मिले।
अब प्रशासन को भले ही अन्य अनाथ आश्रमों की सुध आई हो, मगर एक हकीकत यह भी है कि खुद प्रशासन भी इन अनाथ बच्चों को आश्रम में रखकर भूल ही जाता है। जिन बच्चों की किस्मत अच्छी होती है, उनके माता-पिता जल्द ही मिल जाते हैं। दूसरी ओर कई मासूम अपने बचपन के कई-कई साल अनाथ आश्रम में ही गुजार देते हैं। ऐसी स्थिति में ये बच्चे उम्र के आधार पर प्राइवेट एनजीओ द्वारा संचालित एक आश्रम से दूसरे आश्रम तक भटकते रहते हैं।
कविनगर स्थित प्रेरणा परिवार बाल आश्रम में रह रहे कई बच्चे हैं जो लोनी से ही हैं, बावजूद इसके अब तक पुलिस प्रशासन उनका घर तक नहीं ढूंढ पाई है। करीब ढ़ाई वर्ष पूर्व पुराना रेलवे स्टेशन पर मिले सूरज के परिवार को भी अब तक पुलिस ढूंढने में नाकाम रही है। स्पेशल चाइल्ड ईशू को भी एक साल से अधिक समय आश्रम में हो चुका है, मगर उसके परिवार का भी पता अब तक नहीं लग सका है। अलग-अलग आश्रम में ऐसे न जाने कितने सूरज और इशू हैं जो परिवार से मिलने को तड़प रहे हैं।
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नहीं मिलता कोई सरकारी अनुदान
प्रेरणा बाल आश्रम संचालक आचार्य तरुण ने बताया कि आश्रम चलाने के लिए उन्हें कोई सरकारी अनुदान नहीं मिलता है। एनजीओ के अपने सदस्य हैं जो आर्थिक तौर पर मासिक मदद करते हैं। इसके साथ ही सामाजिक लोग अपनी स्वेच्छा से बच्चों के लिए खाने-पीने, कपड़े दे जाते हैं।
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आश्रम की सुधरी हालत
डीएम के निरीक्षण और नोटिस के बाद प्रेरणा परिवार बाल आश्रम में बच्चों की व्यवस्था में काफी सुधार हुआ। निरीक्षण में भवन की जिन दीवारों पर सीलन मिली थी, अब नए सिरे से उनका रंग-रोगन किया गया है। बच्चों के खाने-पीने, सोने और खेलने की व्यवस्थाओं में भी सुधार हुआ है। बातचीत में बच्चों ने बताया कि उन्हें आश्रम में कोई तकलीफ नहीं है, फिर भी अपनों के पास न होने का दर्द उनकी आंखों में झलक आया।
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समय से मॉनिटरिंग कमेटी भी नहीं करती निरीक्षण
अनाथ आश्रमों में रह रहे बच्चों की व्यवस्था का जायजा लेने के लिए जिला स्तर पर मॉनिटरिंग कमेटी होती है। कमेटी का काम हर माह आश्रमों का निरीक्षण कर उनकी सुविधा, रहन-सहन का जायजा लेना होता है। गाजियाबाद में हाल यह है कि जब कोई हादसा होता है तभी यह कमेटी निरीक्षण करने निकलती है। गत वर्ष कमेटी द्वारा तब निरीक्षण किया गया था जब साहिबाबाद स्थित दो अनाथ आश्रम से बच्चे भाग निकले थे। इसके बाद सीधे डीएम द्वारा हाल ही में निरीक्षण किया गया।
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आकांक्षा समिति से जगी उम्मीद
डीएम के निरीक्षण के बाद आकांक्षा समिति द्वारा भी अनाथ आश्रमों में निरीक्षण किया जा रहा है। समिति के प्रयास से ही पिछले दिनों घरौंदा बाल आश्रम के एक बच्चे को उसके परिवार से मिलाया जा सका। समिति की सदस्य पूनम शर्मा ने बताया कि समिति अब अपने स्तर पर आश्रम में रह रहे बच्चों की काउंसलिंग कर उनके परिवार को खोजेगी।