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Ghaziabad News: सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पैसिव यूथेनेशिया प्रक्रिया पर चर्चा तेज

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गाजियाबाद। हरीश राणा केस में सुप्रीम फैसले के बाद पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया को लेकर चिकित्सा और कानूनी विशेषज्ञों के बीच चर्चा तेज हो गई है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि विशेष परिस्थितियों में मरीज को जीवन रक्षक उपकरणों पर अनावश्यक रूप से बनाए रखना जरूरी नहीं है। बशर्ते सभी कानूनी और चिकित्सीय प्रक्रियाओं का पालन किया जाए। इस संदर्भ में डॉक्टरों ने बताया कि किसी मरीज के सपोर्ट सिस्टम को हटाने की प्रक्रिया बेहद संवेदनशील और चरणबद्ध होती है।
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एमएमजी अस्पताल के सीनियर एनेस्थेटिस्ट डॉ. चरन सिंह कहते हैं कि किसी मरीज को पैसिव यूथेनेशिया की स्थिति में ले जाना अचानक या बिना योजना के नहीं किया जाता। अगर मरीज लंबे समय से लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर है और उसके ठीक होने की संभावना बहुत कम है तो अस्पताल का मेडिकल बोर्ड इस पर विचार करता है। साथ ही परिवार की सहमति और कानूनी दिशा-निर्देश के तहत निर्णय लिया जाता है।
डॉ. सिंह ने बताया कि लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की प्रक्रिया में मरीज को आरामदायक स्थिति में रखा जाता है। साथ ही दर्द निवारक या सिडेशन दवाओं का प्रयोग किया जा सकता है ताकि किसी तरह की पीड़ा न हो। इसके बाद धीरे-धीरे वेंटिलेटर या अन्य उपकरणों का समर्थन कम किया जाता है। इस मामले में अंतिम निर्णय एम्स के चिकित्सक ही लेंगे।
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सर्जन डॉ. मिलिंद गौतम कहते हैं कि यह प्रक्रिया केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और भावनात्मक रूप से भी संवेदनशील है। इसलिए एक से अधिक विशेषज्ञों की राय ली जाती है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, मेडिकल बोर्ड की मंजूरी, दस्तावेजी प्रक्रिया और परिवार की स्पष्ट सहमति अनिवार्य है। उनका कहना है कि प्रक्रिया का उद्देश्य केवल मरीज को कष्ट से मुक्ति देना है, न कि जल्दबाजी में निर्णय लेना। इसलिए पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता और मेडिकल प्रोटोकॉल के तहत होगी।
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