जिले में अस्थमा के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है और यह स्थिति अब चिंता का विषय बनती जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार खराब वायु गुणवत्ता, घरों में जमा धूल और बारिश से बढ़ती नमी इस बीमारी को तेजी से बढ़ा रही है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक पिछले वर्ष की तुलना में अस्थमा के मामलों में करीब 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। मरीजों को इस बीमारी के बारे में जागरूक करने के लिए पांच मई को विश्व अस्थमा दिवस के रूप में मनाया जाता है।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पहले गर्मियों में रोजाना 20 से 25 मरीज अस्थमा और सांस की समस्या लेकर अस्पताल पहुंचते थे लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 30 से 35 हो गई है। इनमें से करीब 10 मरीजों की हालत गंभीर होने पर उन्हें भर्ती करना पड़ रहा है। एक महीने में एक हजार से अधिक मरीज इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे हैं। जिलेभर में जनवरी में 1400, फरवरी में 980, मार्च में 900 और अप्रैल में 1280 मरीज सामने आए। इनमें से करीब 300 मरीजों को भर्ती कर इलाज करना पड़ा। डॉक्टर मरीजों को नियमित भाप लेने और अधिकतर मामलों में इनहेलर का उपयोग करने की सलाह दे रहे हैं।
आईएमए के पूर्व सचिव व वरिष्ठ छाती रोग विशेषज्ञ डॉ. आशीष अग्रवाल का कहना है कि अब अस्थमा केवल मौसमी बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि यह सालभर रहने वाली समस्या बन चुकी है। प्रदूषण बढ़ने के दौरान ओपीडी में श्वसन रोगियों की संख्या में लगभग 40 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गई है। इनमें अस्थमा के मरीजों की संख्या सबसे अधिक है। गंभीर मामलों में अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या भी 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ी है।
बच्चों में भी बढ़ रही परेशानी
संयुक्त अस्पताल संजय नगर के छाती रोग विशेषज्ञ डॉ. राहुल वर्मा के अनुसार बच्चों में भी यह बीमारी तेजी से बढ़ रही है। हाल के एक अध्ययन में शहरी क्षेत्रों के पांच से 15 वर्ष के बच्चों में अस्थमा की दर करीब 10 प्रतिशत पाई गई है। इसमें इनडोर एलर्जन और पारिवारिक इतिहास मुख्य कारण माने गए हैं। घरों और दफ्तरों में लगे पर्दे, कालीन और मैट में जमा धूल अस्थमा के मरीजों के लिए खतरनाक साबित हो रही है। सफाई के दौरान यह धूल सांस के साथ शरीर में पहुंचती है और समस्या को बढ़ा देती है। बारिश में नमी बढ़ने से फफूंदी और धूल के कण तेजी से पनपते हैं, जो स्थिति को और गंभीर बना देते हैं।
ये हैं अस्थमा के प्रमुख कारण
-घर और दफ्तर में जमा धूल और गंदगी
-वायु प्रदूषण और धुएं का बढ़ता स्तर
-बारिश में बढ़ती नमी और फफूंदी
--बीड़ी सिगरेट और अन्य नशे का सेवन
-पारिवारिक इतिहास और एलर्जी
बचाव के उपाय
-पर्दे और मैट की नियमित सफाई करें
-घर में नमी और फफूंदी बनने से रोकें
-प्रदूषण वाले क्षेत्रों में मास्क का उपयोग करें
-डॉक्टर की सलाह से इनहेलर और दवाएं लें
-धूम्रपान और नशे से दूरी बनाए रखें