नगर निगम अधिकारी शहर को साफ बनाने के दावे भले कर रहे हो, लेकिन हकीकत कुछ और ही है। शहर में जगह-जगह कूड़े के ढेर लगे हैं। बीच बाजार और मुख्य मार्गों पर कचरा डाला जा रहा है। नगर निगम के कमतर इंतजाम, शहर को साफ रखने में काम नहीं आ रहे हैं। हालात यही रहे तो यह गंदगी गर्मी के सीजन में लोगों को बीमारियां बांट सकती है।
दिल्ली से सटा और आर्थिक स्थिति में मजबूत होने के बावजूद नगर निगम सेनिटेशन में फिसड्डी साबित हो रहा है। 550 करोड़ के सालाना बजट वाला नगर निगम शहर में कवर्ड कूड़ाघर भी नहीं बनवा पाया है। जो कवर्ड कूड़ाघर पहले से बने हुए थे वह भी टूट चुके हैं।
बीते साल देश भर के 75 शहरों में हुए स्वच्छता सर्वेक्षण में गाजियाबाद का नाम भी 10 फिसड्डी शहरों की सूची में रहा था। इस साल जनवरी महीने में हुए 500 शहरों के स्वच्छता सर्वेक्षण का परिणाम आना बाकी है। हालांकि सफाई के जैसे इंतजाम गाजियाबाद में हैं, उनके मुताबिक इस बार भी परिणाम ज्यादा बेहतर रहने की उम्मीद नहीं है।
टॉयलेट्स की कमी, खुले में गंदगी करते हैं लोग
गाजियाबाद में सार्वजनिक और सामुदायिक शौचालय की कमी पर एनजीटी भी फटकार लगा चुका है। शौचालयों की कमी की वजह से लोग खुले में गंदगी करते हैं। बाजारों में लोग खुले में यूरिन करते हैं। नगर निगम ने इसको रोकने के लिए कदम नहीं उठाए हैं। हालांकि एनजीटी की फटकार के बाद अब शौचालयों का निर्माण शुरू किया गया है।
शहर में करीब 150 सार्वजनिक शौचालय और 67 सामुदायिक टॉयलेट्स बनाए जा रहे हैं। स्मार्ट कूड़ा घर बनाए जाने के लिए भी केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है। पैसा मिलते ही इनका निर्माण भी शुरू हो जाएगा। गंदगी करने वालों पर कार्रवाई के लिए पॉलिसी भी पास हो गई है। छह महीने में शहर और स्वच्छ नजर आने लगेगा। - डीके सिन्हा, अपर नगर आयुक्त