घूकना में फीस के तानों और पिता के अपमान से आहत होकर जान देने वाली प्रियांशी की मौत ने शहर को झकझोर दिया है। पुलिस अभी भी दो फरार टीचर्स को गिरफ्तार नहीं कर सकी है। पुलिस की लापरवाही का फायदा उठाकर स्कूल संचालक सुबूत मिटाने में जुटा है।
रातों रात स्कूल से 12वीं तक का बोर्ड उतारकर 8वीं तक का बोर्ड लगा दिया गया है। स्कूल की दीवारों पर भी पेंट करके अब स्कूल के 8वीं तक की मान्यता की बात लिख दी गई है। जबकि पहले 12वीं तक के बोर्ड लगे थे।
स्थानीय लोगों की मानें तो रात के समय स्कूल संचालक आते हैं और कुछ फाइलें उठा कर ले जाते हैं। यहां तक कि स्कूल का बोर्ड भी वह उतार ले गए। आसपास की दीवारों पर जहां स्कूल के नाम का पेंट किया गया था। इसे भी बदला गया है।
स्कूल से कुछ दूर हटकर ही मकानों की दीवार पर पूर्व में स्कूल के विज्ञापन में 12वीं कक्षा तक की मान्यता का जिक्र था, अब इसे भी बदल दिया गया है। रविवार सुबह जब लोग उठे तो दीवार पर 12वीं की जगह 8वीं तक मान्यता प्राप्त लिखा हुआ था।
उधर इस घटना के बाद से अब स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के परिजनों ने स्कूल संचालकों की पोल खोलनी शुरू कर दी है। लोगों का कहना है कि पूर्व में भी स्कूल में फीस या फिर होम वर्क न करने पर बच्चों की बेदर्दी से पिटाई की जाती थी।
स्कूल प्रिंसिपल शशि की पिटाई का शिकार हो चुके रविकांत ने बताया कि करीब आठ वर्ष पूर्व होम वर्क न करने पर प्रिंसिपल ने उसे इस कदर पीटा था कि उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
इस घटना के बाद उसके परिजनों ने स्कूल से नाम कटवा दिया था। स्थानीय लोगों ने रविकांत की बात पर हामी भरते हुए कहा कि तब मामले को स्कूल संचालकों ने दबा दिया था, मगर इस बार तो अति ही हो गई है।
किसी ने लगाया मारपीट का आरोप, तो कहीं छात्रवृत्ति न मिलने की बात
एक दिन भी फीस लेट हो जाने पर बच्ची को घर भेज दिया जाता है। ऐसे में वे हमेशा समय से ही फीस जमा करते हैं। -राकेश कुमार, अभिभावक
मेरे दो बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं, कई बार ऐसा हुआ जब फीस जमा न करने पर बच्चों को घर भेज दिया गया। कई बार स्कूल जाकर मिन्नतें भी की लेकिन फीस जमा न होने पर हर रोज बच्चों को वापस भेज दिया जाता था। - कल्पना
स्कूल मान्यता प्राप्त है और बच्चों की छात्रवृत्ति भी आती है। आज तक कभी उसके किसी भी बच्चे को छात्रवृत्ति का पैसा नहीं दिया गया। छात्रवृत्ति का पैसा भी स्कूल वाले खुद ही रख लेते थे। - हुकुमचंद, अभिभावक
फीस के लिए परेशान तो करते ही थे। कोई अभिभावक यदि बच्चे का नाम कटवाने जाता तो नाम भी नहीं काटते थे। - छतरपाल, अभिभावक