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Ghaziabad News: 97 हजार से अधिक मामलों में नहीं मिल पा रहे काउंसिल, सुनवाई प्रभावित

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गाजियाबाद। जिले की विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। इसके साथ ही न्यायिक प्रक्रिया की रफ्तार भी प्रभावित हो रही है। स्थिति यह है कि करीब 97 हजार से अधिक मामलों में आरोपियों या वादकारियों को पैरवी के लिए काउंसिल उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। जिले में कुल लंबित मामलों की संख्या 3.40 लाख से अधिक पहुंच चुकी है, जिससे अदालतों पर दबाव बना हुआ है। मुकदमों की सुनवाई में देरी के पीछे केवल अधिवक्ताओं की कमी ही नहीं बल्कि कई अन्य कारण भी सामने आ रहे हैं। बड़ी संख्या में मामलों में स्थगन आदेश जारी हैं, कई आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं, जबकि कुछ मामलों में गवाहों के न आने और दस्तावेजों की उपलब्धता में देरी भी सुनवाई को प्रभावित कर रही है।
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नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड के अनुसार जिले में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार लगभग 9532 मामलों में स्थगन आदेश लागू है, जबकि 5459 मामले ऐसे हैं, जिनमें आरोपी अभी तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। इसके अलावा 4447 मामलों में गवाहों की अनुपलब्धता के कारण सुनवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है। वहीं 1843 मामलों में आवश्यक दस्तावेजों का इंतजार किया जा रहा है और 1832 मामले हाईकोर्ट से मिले स्थगन आदेश के चलते लंबित हैं। इन सभी कारणों ने मिलकर अदालतों के कामकाज को काफी धीमा कर दिया है। जमीनी स्तर पर स्थिति यह है कि बढ़ते मामलों के अनुपात में काउंसिल की उपलब्धता सीमित पड़ रही है, जिसके कारण हजारों मामलों में समय पर अधिवक्ता नहीं मिल पा रहे हैं। इससे कई मुकदमों में सुनवाई आगे नहीं बढ़ पाती और वे लंबित रह जाते हैं।

पूर्व बार सचिव परविंदर नागर ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि लगातार बढ़ते मुकदमों के अनुपात में अधिवक्ताओं की संख्या और उनकी उपलब्धता बढ़ाना बेहद जरूरी है। उनका कहना है कि यदि इस समस्या का समाधान जल्द नहीं किया गया तो न्यायिक प्रणाली पर दबाव और अधिक बढ़ेगा तथा मामलों के निस्तारण में और अधिक देरी होगी। पूर्व सचिव का कहना है कि अदालतों में लंबित मामलों का बढ़ता आंकड़ा और काउंसिल की कमी न्याय व्यवस्था के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है, इसके त्वरित समाधान की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही है।
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प्राधिकरण की तरफ से उपलब्ध कराया जाता है काउंसिल
जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव नेहा बनौधिया का कहना है कि जिन भी आरोपियों या वादकारियों द्वारा विधिक सहायता के लिए आवेदन किया जाता है, उन्हें प्राधिकरण की ओर से काउंसिल उपलब्ध कराया जाता है। उनके अनुसार पात्र लोगों को विधिक सहायता प्रदान करने की व्यवस्था पूरी तरह सक्रिय है, ताकि किसी भी व्यक्ति को न्यायिक पैरवी से वंचित न रहना पड़े।
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