प्राचीन भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति की विदेशों में लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। इसका अंदाजा इसी से ही लगाया जा सकता है कि साउथ कोरिया, जर्मनी, यूरोप के बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स आयुर्वेद की डिग्री हासिल करने के लिए भारत आ रहे हैं।
इनमें से ही एक हैं साउथ कोरिया की रहने वाली मिनयोंगली, जो आयुर्वेद से इस कदर प्रभावित हुईं कि वह बीएएमएस की पढ़ाई करने इंडिया आ गईं। बेटी की जिद और उसकी चाहत को देखते हुए उनके माता-पिता ने भी भारत को ही अपना ठिकाना बना लिया है।
मां-बाप वर्क परमिट लेकर दिल्ली में रेस्टोरेंट चला रहे हैं और मिनयोंगली फिलहाल गाजियाबाद के जिला एमएमजी अस्पताल से इंटर्नशिप कर रही हैं।मिनयोंगली ने बताया कि दक्षिण कोरिया में प्राकृतिक चिकित्सा को काफी पसंद किया जाता है और प्राकृतिक चिकित्सा का स्कोप देखते हुए उन्होंने आयुर्वेद को चुना।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयुर्वेद और भारत के बारे में काफी सुना था। इसीलिए बीएएमएस का कोर्स करने करीब छह साल पहले वह भारत आ गईं। मिनयोंगली ने बताया कि मुजफ्फरनगर के भारत आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज से उन्होंने बीएएमएस की पढ़ाई करने के बाद गाजियाबाद स्थित जिला एमएमजी अस्पताल में इंटर्नशिप कर रही हैं।
इंटर्नशिप एक माह की है। इसके बाद उन्हें कॉलेज की शर्तों के अनुसार छह माह तक भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में मेडिकल सेवा देनी होगी। मिनयोंगली के अनुसार साउथ कोरिया में एलोपैथिक के मुकाबले प्राकृतिक चिकित्सा ज्यादा लोकप्रिय हो रही है।
एमएमजी अस्पताल में त्वचा रोग विशेषज्ञ डा. एके दीक्षित के नेतृत्व में वह इंटर्नशिप कर रही हैं। वह अपने देश में आयुर्वेद पद्धति से स्किन स्पेशलिस्ट के रूप में पहचान बनाना चाहती हैं।
छह साल में सीख ली हिंदी और संस्कृत
साउथ कोरिया की मिनयोंगली मात्र छह साल पूर्व ही भारत आई हैं। गोल मटोल चेहरा और छोटी आंखों वाली इस विदेशी युवती की फर्राटेदार अंग्रेजी को भले ही कोई साधारण रूप में ले मगर जब वह हिंदी बोलती हैं तो अच्छे-अच्छों की बोलती बंद हो जाती है।
छह ही साल में मिनयोंगली न केवल बेहतरीन हिंदी बोलना सीख गई हैं बल्कि संस्कृत भाषा को भी अच्छी तरह सीख और समझ लिया है। संस्कृत भाषा में रामायण के कई श्लोक उन्हें कंठस्थ हैं।