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Bulandshahar News: आठ साल में 2.37 करोड़ पौधे रोपे, फिर भी नहीं दिख रही हरियाली

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बुलंदशहर। जिले को हरा-भरा करने के लिए पिछले आठ वर्षों में 2.37 करोड़ से अधिक पौधे रोपित किए गए। बावजूद इसके जिले में न तो सघन वन क्षेत्र दिख रहा और न ही सड़कों किनारे छाया। बढ़ता तापमान पर्यावरण संरक्षण की पोल खोल रहा है। वहीं, पौधरोपण अभियान भी खानापूर्ति तक सिमट गए। वहीं, इस बार फिर से 39 लाख पौधे लगाने की तैयारी है।
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पर्यावरण को बचाने के लिए जागरूकता अभियान चलाने के साथ अनेक कार्यक्रम होते रहते हैं। वहीं, शासन के निर्देश अनुसार जिले में वन विभाग की ओर से पिछले आठ साल से लगातार पौधे रोपित किए जा रहे हैं। हर बार विभागीय अधिकारियों का दावा रहता है कि हरियाली बढ़ेगी और पर्यावरण में सुधार होगा। वन विभाग के आकड़ों के अनुसार पिछले आठ साल में जिले में 2.37 करोड़ से अधिक पौधे रोपे गए। हालत यह है कि जहां अधिक पौधे लगाए गए हैं, वहां अधिकतर पौधे गायब हो चुके हैं।
गड्ढे भी दिखाई नहीं दे रहे हैं। यह स्थिति तब है, जब इसकी जिम्मेदारी वन विभाग के साथ 26 विभागों को दी जाती है लेकिन अनदेखी के चलते अधिकतर स्थान ऐसे हैं, जहां पर पौधे पेड़ बनने से पहले ही गायब हो गए। इसका कारण पौधा के संरक्षण का अभाव माना जा रहा है। इसका जीता जागता परिणाम यह है कि राष्ट्रीय राजमार्ग समेत प्रमुख मार्गों के किनारे हरियाली गायब है। गंगा किनारे हर साल वन विभाग पेड़ लगाने का दावा करता है लेकिन वहां भी हरियाली दिखाई नहीं देती है।
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पिछले आठ साल में रोपे गए पौधे
वर्ष कुल रोपे गए पौधे
2024-25 37.00 लाख
2023-24 37.67 लाख
2022-23 42,78 लाख
2021-22 40,19 लाख
2020-21 33,13 लाख
2019-20 32,21 लाख
2018-19 16,46 लाख
2017-18 7,45 लाख
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सालभर में अभियान के नाम पर हुई खानापूर्ति
पर्यावरण को स्वच्छ बनाने के लिए प्लास्टिक मुक्त अभियान के लिए नगर पालिका के अधिकारी गंभीर नहीं हैं। पिछले एक साल में अधिकतर निकायों में अभियान के नाम पर खानापूर्ति की गई है। बुलंदशहर, सिकंदराबाद, खुर्जा जहांगीराबाद समेत चार निकायों ने ही अभियान चलाकर पॉलिथीन जब्त करने और जुर्माना वसूलने की कार्रवाई की है। शासन के निर्देश पर कुछ समय के लिए तो जिले की नौ नगर पालिका और आठ नगर पंचायतों के अधिकारियों ने अभियान चलाकर खानापूर्ति की, लेकिन इसके बाद न तो अभियान चलाया गया और न ही पॉलिथीन के प्रयोग रोकने के लिए कोई कार्रवाई की।
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ग्रामीण क्षेत्र में प्लास्टिक के लगे ढेर, तालाब भी अछूते नहीं
पर्यावरण को बिगाड़ने में प्लास्टिक को विशेष माना जाता है। जिले के ग्रामीण क्षेत्र की बात करें तो जगह-जगह प्लास्टिक के ढेर लगे हैं। अधिकारी इनके संचालन का दावा करते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि इनका संचालन नहीं हो रहा और ताले लटके हुए हैं। कभी ग्रामीणों को जागरूक नहीं किया गया। इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो इसके आने वाले समय में दुष्परिणाम सामने आएंगे।
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पर्यावरण बचाने की अलख जगा रहे राजेंद्र पथिक
एक ओर जहां पर्यावरण बचाने के दावों के बीच जागरूकता का अभाव है। वहीं, अवकाश प्राप्त अधिकारी व पर्यावरणविद राजेंद्र पथिक पर्यावरण बचाने की अलख जगा रहे हैं। वह पिछले कई वर्षों से पंपलेट बांटकर लोगों को जागरूक करने का काम कर रहे हैं। उनका कहना पर्यावरण का संकट कोई मामूली संकट नहीं, बल्कि यह जीवन का संकट है। यह संकट इसलिए पैदा हुआ है, क्योंकि पर्यावरण के प्रति राज, समाज की आस्था खत्म हो गई है।
यह संकट हमने खुद से पैदा किया है। जब तक यह जागरूकता व आस्था फिर से पैदा नहीं हो जाती, पर्यावरण का संकट दूर नहीं होगा। यदि जागरूकता व आस्था होती तो पर्यावरण दिवस मनाने की जरूरत नहीं पड़ती। बिगड़ते पर्यावरण का असर हर क्षेत्र में साफ दिखाई दे रहा है। बिगड़ते पर्यावरण को बचाना है तो अधिक से अधिक पौधे लगाए जाए। साथ ही ऐसे कदम उठाने होंगे, जिससे पर्यावरण को बचाया जा सके। इसके लिए सभी उन चीजों का प्रयोग करने से परहेज करना होगा, जिससे पर्यावरण लगातार बिगड़ता जा रहा है।
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कोट
अभी मैं एक कार्यक्रम में हूं। पिछले कई वर्षों में जिले का वन क्षेत्र बढ़ा है। हर साल जो पौधे रोपित किए जाते हैं, उन्हें बचाने का हर संभव प्रयास किया जाता है। इनमें से 10 से 15 फीसदी पौधे नष्ट हो जाते हैं। जिले की हरियाली को बरकरार रखने के लिए ठोक कदम उठाए जा रहे हैं।
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-डॉ. हरेंद्र सिंह, डीएफओ।
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