राजधानी में प्रदूषण कम करने के लिए एनजीटी ने सभी लैंडफिल साइटों से कचरा हटाने के निर्देश दिए हैं, लेेकिन कूड़े के पहाड़ों पर बोझ और बढ़ता ही जा रहा है।
मानसून से पहले तीनों एमसीडी ने नालों से गाद निकालने के बाद इन्हें लैंडफिल साइट पर फेंक दिया। यह एक नई चुनौती बन गया। वर्तमान आंकड़ों के मुताबिक, लैंडफिल साइटों पर बोझ एक लाख 30 हजार मीट्रिक टन बढ़ गया है।
तीनों लैंडफिल साइटों से कचरे को हटाया जाए तो इन पर 1000 करोड़ से अधिक खर्च की संभावना है। इसका इस्तेमाल सड़कें बनाने और गड्ढों को भरने के अलावा कहीं नहीं किया जा सकता।
पिछले महीने राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने अपने आदेश में सभी स्थानीय निकायों को कचरा हटाने के निर्देश देते हुए कहा था कि इसे लागू करने में देरी होती है तो क्यों न अधिकारियों के वेतन में कटौती कर दी जाए।
इस कार्य के लिए सभी स्थानीय निकायों को 250 करोड़ रुपये का भुगतान करने को भी कहा गया है। उत्तरी दिल्ली नगर निगम क्षेत्र के दायरे में स्थित भलस्वा में अब भी 80 लाख टन से अधिक कचरा है। गाजीपुर और ओखला में भी करीब दो लाख टन कचरा इकट्ठा कर तीनों निगम इससे निपटने का रास्ता तलाश रहे हैं।
गाजीपुर, भलस्वा, ओखला स्थित लैंडफिल साइट पर अब भी 280 लाख टन कचरा है। यह अब भी लगातार बढ़ रहा है। गाजीपुर में 140, भलस्वा में 80 और ओखला में 50 लाख टन से अधिक कूड़ा इकट्ठा हो चुका है। दो की ऊंचाई तो कुतुबमीनार से भी अधिक है। कचरा हटाने की शुरुआत करने से पहले निगमों को इसे फेंकने के लिए जगह चाहिए।
दिल्ली में ऐेसी जगह फिलहाल नहीं है। कही है भी तो अभयारण्य या जंगल हैं। ऐसे में पड़ोसी राज्यों में जमीन तलाशी जा रही है। इसके लिए हरियाणा और उत्तर प्रदेश किसी भी सूरत में तैयार नहीं हैं। इसके लिए मशीनरी का इस्तेमाल किया जाए तो उस पर करोड़ों का खर्च होगा। तीनों एमसीडी की वित्तीय स्थिति खराब होने की वजह से इसे भी अमली जामा पहनाना बड़ी चुनौती है।
एनएचएआई भी नहीं कर पाया मदद
कुछ दिन पहले पूर्वी दिल्ली नगर निगम ने सड़क बनाने में पुराने मलबे का इस्तेमाल करने के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) से मशविरा किया। कचरे को हटाने पर सैकड़ों करोड़ के खर्च और टेंडर की प्रक्रिया में जटिलताओं की वजह से इस योजना को भी अमली जामा नहीं पहनाया जा सका।
विकल्प लागू करने में देरी से गहराया संकट
तीनों निगमों ने कचरे से निपटने के लिए आईआईटी सहित अन्य संस्थानों के सहयोग से नई योजनाएं तैयार कीं। रिपोर्ट में लैंडफिल साइटों की ऊंचाई और ढलान, कूड़े से गैस और खाद बनाने, बायोडायवर्सिटी पार्क और कृत्रिम घास लगाने आदि विकल्प सुझाए गए थे। इन्हें लागू करने में देरी से संकट और विकराल हो गया है।