राजधानी में गणेश चतुर्थी की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में गणपति बप्पा की प्रतिमाएं अंतिम रूप ले रहीं हैं। इस बार इन प्रतिमाओं की खास बात यह है कि बप्पा को आकार देने के लिए देश के अलग-अलग राज्यों से मिट्टी और दूसरी प्राकृतिक सामग्री दिल्ली पहुंच रही है। चार राज्यों की मिट्टी से तैयार हो रहे बप्पा इस बार लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। कहीं बंगाल से लाई गई मिट्टी का इस्तेमाल हो रहा है तो कहीं मध्य प्रदेश से आई लकड़ी और बांस प्रतिमा को मजबूती दे रहे हैं। चार तरह की मिट्टी, पराली और दूसरी सामग्री को मिलाकर कारीगर प्रतिमाओं को ऐसा रूप दे रहे हैं कि तैयार होने के बाद भगवान गणेश का स्वरूप जीवंत नजर आता है।
सागरपुर, मधु विहार, अर्जुन गढ़, सरोजिनी नगर, मुनिरका, भीकाजी कामा प्लेस, अर्जुन पार्क, कालकाजी और द्वारका समेत कई इलाकों में गणेश प्रतिमाएं तैयार की जा रहीं हैं। इन जगहों पर करीब 100 कारीगर काम कर रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या महिला कारीगरों की है। कारीगरों के मुताबिक, प्रतिमा तैयार करने का काम गणेश चतुर्थी से करीब दो से तीन महीने पहले शुरू हो जाता है। सबसे पहले अलग-अलग तरह की मिट्टी को तैयार किया जाता है। इसके बाद पराली और दूसरी सामग्री की मदद से प्रतिमा का ढांचा बनाया जाता है। मिट्टी की परत चढ़ाकर उसे आकार दिया जाता है। सूखने के बाद प्रतिमा के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ा जाता है।
बंगाल की काली मिट्टी से बन रहे बप्पा
गणेश प्रतिमाओं के लिए पश्चिम बंगाल से लाई जाने वाली मिट्टी की मांग ज्यादा है। कलाकारों के अनुसार, बंगाल की मिट्टी से प्रतिमा के चेहरे और शरीर की बारीक आकृतियों को उभारने में मदद मिलती है। वहीं, मध्य प्रदेश से लकड़ी और बांस समेत दूसरी सामग्री मंगाई जाती है। खंडवा और खरगोन जैसे इलाकों से आने वाली सामग्री का इस्तेमाल प्रतिमा के ढांचे को तैयार करने में किया जाता है। राजधानी में अलग-अलग स्थानों पर तैयार हो रही प्रतिमाओं में छोटी मूर्तियों से लेकर 10 फुट से ज्यादा ऊंची प्रतिमाएं भी शामिल हैं। बड़े गणपति की मांग मुख्य रूप से पूजा पंडालों के लिए है, जबकि छोटे आकार की प्रतिमाएं घरों में स्थापना के लिए खरीदी जा रही हैं। वहीं, काली मिट्टी से बने बप्पा भी इस बार सभी का ध्यान खींच रहे हैं। कारीगरों के अनुसार इस मिट्टी को दूसरे क्षेत्रों से मंगाया जाता है। काली मिट्टी से बनी प्रतिमाओं का स्वरूप सामान्य मिट्टी की प्रतिमाओं से अलग दिखाई देता है।
पांच चरणों में बनते हैं बप्पा
अर्जुन पार्क में काम कर रहे कारीगरों के अनुसार, गणेश प्रतिमा को तैयार करने की प्रक्रिया पांच चरणों में पूरी होती है। सबसे पहले प्रतिमा का आसन और मूल ढांचा तैयार किया जाता है। इसके बाद पेट और पैरों को आकार दिया जाता है। तीसरे चरण में हाथ बनाए जाते हैं। चौथे चरण में गर्दन और सूंड तैयार की जाती है। पांचवें और अंतिम चरण में कान, मुकुट और चेहरे की दूसरी बारीकियों पर काम होता है। इसके बाद प्रतिमा को रंग और सजावट से अंतिम रूप दिया जाता है। कारीगरों ने बताया कि गणेश प्रतिमा बनाने की कला उन्हें परिवार से मिली है। कई महिला कलाकारों ने अपनी मां और परिवार के दूसरे सदस्यों से मिट्टी से आकृतियां बनाना सीखा। अब यही पारंपरिक कला उनके रोजगार का जरिया भी बन गई है।
गणेश महोत्सव फीका, मूर्तियां तैयार पर खरीदारों का इंतजार
गणेश महोत्सव की तैयारियां पूरी हो गईं हैं और मूर्ति कलाकारों ने महीनों की मेहनत से भगवान गणेश की आकर्षक मूर्तियां तैयार कर ली हैं। लेकिन, इस बार बाजार में खरीदारों की कमी ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। महंगाई का असर अब त्योहारों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। पूर्वी दिल्ली के पटपड़गंज, दुर्गापुरीचौक, लोनी, समेत कई अन्य इलाकों के पास वर्षों से मूर्ति निर्माण और बिक्री करने वाले कलाकार ग्राहकों का इंतजार कर रहे हैं।
मूर्ति कलाकारों का कहना है कि इस साल गणेश महोत्सव से उन्हें बेहतर कारोबार की उम्मीद थी। सार्वजनिक स्तर पर उत्सव के आयोजन बढ़ने और बाजार में रौनक लौटने की संभावना को देखते हुए उन्होंने कई महीने पहले ही तैयारियां शुरू कर दीं थीं। हालांकि महोत्सव शुरू होने में अब कुछ ही दिन बचे हैं, लेकिन बिक्री उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पाई है।
मूर्तिकार गोपाल ने बताया कि महंगाई का असर पिछले दो साल से उनके कारोबार पर पड़ रहा है। इस बार उन्हें उम्मीद थी कि बिक्री में सुधार होगा, इसलिए उन्होंने करीब छह महीने पहले से मूर्तियां बनानी शुरू कर दी थीं। उन्होंने बताया कि पहले गणेश चतुर्थी के दौरान 500 से 1000 मूर्तियां आसानी से बिक जाती थीं, लेकिन इस साल 200 से 250 मूर्तियां भी नहीं बिक सकी हैं। उनका मानना है कि बढ़ती महंगाई के कारण लोगों की खर्च करने की क्षमता प्रभावित हुई है, जिसका असर मूर्तियों की मांग पर भी पड़ा है।
मूर्ति कलाकार सुरेश बताते हैं कि गणेश उत्सव की तैयारियां आमतौर पर तीन से चार महीने पहले शुरू हो जाती हैं ताकि समय पर अधिक संख्या में मूर्तियां तैयार की जा सकें। हालांकि इस बार कलाकारों ने सीमित संख्या में ही मूर्तियां बनाईं हैं। उन्होंने बताया कि पर्यावरण संरक्षण को लेकर मिट्टी की मूर्तियों की मांग बढ़ी है, लेकिन इन्हें तैयार करने में अधिक समय और लागत लगती है। इसके कारण मूर्तियां बनाने के ऑर्डर भी कम मिले हैं।
मोदक से लड्डू तक, भगवान गणेश के हैं प्रिय भोग
गणेश महोत्सव के दौरान श्रद्धालु भगवान गणेश की पूजा-अर्चना के साथ उन्हें कई प्रकार के भोग लगाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश को मिठाई, फल और दूध पसंद है। गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक भक्त अपने घरों और पंडालों में गणपति बप्पा को सजाने-संवारने और पूजा के अलावा कई प्रकार के प्रसाद का भोग लगाते हैं। उनकी सबसे प्रिय मिठाई मोदक है। चावल या गेहूं के आटे से तैयार किए जाने वाले मोदक में गुड़, नारियल और इलायची की मीठी भरावन होती है। लड्डू भी गणेश जी के प्रिय भोगों में शामिल हैं। विशेष रूप से बेसन और मोतीचूर के लड्डू गणपति को अर्पित किए जाते हैं।