श्मशान हो या कब्रिस्तान नोटबंदी का असर यहां भी दिख रहा है। हालत यह है कि एक शख्स के पास पुराने नोट थे जो बाजार में नहीं चल रहे थे। ऐसे में उसे उधार में कफन खरीदना पड़ा।
अंजुमन इस्लाहुल मुसलिमिन इंतजामिया कमेटी के अध्यक्ष मोहम्मद उमर फारूक ने बताया कि नोटबंदी की वजह से काफी दिक्कत आई है।
कब्रिस्तान में दफनाने से पहले परिजन को एक रसीद कटानी पड़ाती है, जिसे दफन रसीद कहते हैं। इसके लिए भी लोग पुराने नोट लेकर आ रहे हैं। अगर लोग पैसे का इंतजाम कर ले रहे हैं तो बेहतर है। अगर नए नोट का इंतजाम नहीं हो पा रहा है तो उन्हें उधार में ही रसीद दी जा रही है।