सड़क हादसे में गंभीर रुप से घायल एक व्यक्ति को जब एम्स के डॉक्टरों ने ब्रेन डेड घोषित किया और उसके परिजन अंगदान के लिए तैयार हुए तब ट्रांसप्लांट कराने का इंतजार कर रहे मरीजों की तलाश शुरू हुई।
लिवर और किडनी ट्रांसप्लांट कराने वाले मरीज तो दिल्ली में ही मिल गए लेकिन हृदय ट्रांसप्लांट कराने वाले मरीज की तलाश दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और पंजाब तक करने के बाद भी पूरी नहीं हुई।
नतीजा यह हुआ कि हृदय डोनेट करने के बाद भी ट्रांसप्लांट नहीं किया जा सका। सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल परमानंद आर्य (40) को 11 अगस्त को एम्स ट्रामा सेंटर में भर्ती कराया गया था।
हर जगह ढूंढा गया शख्स पर तलाश नहीं हुई पूरी
इलाज के दौरान 13 अगस्त को मरीज को ब्रेन डेड घोषित किया गया। ब्रेन डेड घोषित होने के बाद एम्स के ऑर्गन रिट्रीवल बैंकिंग ऑर्गेनाइजेशन (ऑर्बो) की ओर से मरीज का अंगदान कराने के लिए काउंसलिंग शुरू की गई।
काउंसलिंग के बाद परिजन अंगदान के लिए तैयार हो गए। डोनर का लिवर और दोनों किडनी एम्स में ही मरीजों को प्रत्यारोपित कर दिए गए लेकिन हृदय प्रत्यारोपण कराने वाला कोई मरीज एम्स में नहीं मिला।
इसके बाद एम्स की ओर से हृदय प्रत्यारोपण कराने का इंतजार कर रहे ए पॉजिटिव ब्लड ग्रुप वाले मरीजों की तलाश शुरू कर दी। एम्स के अलावा दिल्ली में आर्मी अस्पताल, जीबी पंत, आरएमएल, मैक्स और गंगा राम में हृदय प्रत्यारोपण की सुविधा है।
आखिरकार एम्स नहीं हो सका कामयाब
यहां के अस्पतालों में भी कोई मरीज नहीं मिला। इसके बाद गुड़गांव के मेदांता और चंडीगढ़ के पीजीआई तक हृदय प्रत्यारोपित कराने का इंतजार कर रहे मरीजों की तलाश हुई लेकिन एम्स को कहीं भी सफलता नहीं मिली।
मैक्स और मेदांता में दो मरीज मिले जिनका हृदय प्रत्यारोपण होना था और उनका ब्लड ग्रुप भी ए पॉजिटिव था लेकिन दोनों मरीजों का वजन 90 किलोग्राम से अधिक था जबकि डोनर का वजन 55 किलोग्राम था, लिहाजा 90 किलोग्राम के अधिक के मरीज में प्रत्यारोपण करना मुश्किल भरा काम था।
अंत में हृदय का इस्तेमाल नहीं किया जा सका। अंगदान करने वाला परमानंद राय मूल रुप से उत्तराखंड के हल्द्वानी निवासी थे और अपने परिजनों के साथ दिल्ली के अंबेडकर नगर इलाके में रहते थे।
9 घंटे तक होती रही तलाश
11 अगस्त को सुबह 7:30 बजे सड़क हादसे में वह गंभीर रूप से घायल होने के बाद उन्हें एम्स ट्रामा सेंटर भर्ती कराया गया था। 13 अगस्त की सुबह करीब 7 बजे ब्रेन डेड घोषित करने के लिए पहली बार टेस्ट किया गया और दोपहर दो बजे दूसरा टेस्ट किया गया।
ढाई बजे ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया। नौ घंटे तक प्रत्यारोपण कराने वाले मरीजों की तलाश हुई उसके बाद रात 11:30 बजे अंग निकालने और प्रत्यारोपण का काम शुरू हुआ जो 14 अगस्त की सुबह तक चलता रहा।
इस पूरी प्रक्रिया में एम्स के करीब 100 डॉक्टरों, नर्सेज, पैरामेडिकल स्टाफ व दूसरे कर्मी लगे रहे।
घर में कमाने वाला अकेला हूं नहीं करा सकता ट्रांसप्लांट
राजस्थान के अजमेर का रहने वाला एक व्यक्ति एम्स में इलाज करा रहा है और उसका हृदय प्रत्यारोपित किया जाना है और उसका ब्लड ग्रुप भी ए पॉजिटिव है।
लिहाजा दिल्ली में मरीज नहीं मिलने के बाद एम्स ने अजमेर में उस व्यक्ति से भी बातचीत की। उसने एम्स से कहा कि हृदय प्रत्यारोपण तो कराना है लेकिन पूरा परिवार अभी उसी पर आश्रित है और वह घर में अकेला कमाने वाला व्यक्ति है, ऐसे में हृदय प्रत्यारोपित कराने की स्थिति में न जाने कितने दिनों तक बिस्तर पर रहना पड़ेगा।
ऐसी स्थिति में मेरे परिवार का भरण-पोषण कैसे होगा। प्रत्यारोपण के बाद भी इलाज में काफी खर्च है। यह कहते हुए उस व्यक्ति ने फिलहाल हृदय प्रत्यारोपित कराने से इनकार कर दिया।