नई दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी द्वारा अलग-अलग दायर तलाक याचिकाएं आपसी सहमति से तलाक में परिवर्तित नहीं की जा सकतीं। कोर्ट ने पारिवारिक अदालत के ऐसे आदेश को अवैध बताया।
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आपसी सहमति से तलाक तभी दिया जा सकता है, जब पति-पत्नी संयुक्त रूप से और स्पष्ट तौर पर अलग होने की इच्छा व्यक्त करें। कोर्ट ने कहा कि यदि दोनों पक्ष अलग-अलग याचिकाएं दायर करते हैं तो उन्हें बाद में आपसी सहमति से तलाक में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने कहा कि आपसी सहमति से तलाक के लिए बुनियादी शर्त यह है कि दोनों पक्षों की सहमति मुकदमे की शुरुआत से पहले मौजूद हो। यह सहमति स्पष्ट, निर्विवाद और स्वतंत्र इच्छा से होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि इस सहमति को अनुमान या परिस्थितियों के आधार पर नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने पारिवारिक अदालत के जुलाई 2024 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पति-पत्नी द्वारा अलग-अलग दायर याचिकाओं (क्रूरता और व्यभिचार के आरोपों के आधार पर धारा 13 के तहत) को आपसी सहमति मानते हुए तलाक का फैसला सुनाया गया था। हाईकोर्ट ने इस फैसले को अवैध करार दिया। खंडपीठ ने कहा कि धारा 13बी की शर्तें केवल औपचारिकता नहीं हैं, बल्कि ये वैधानिक सुरक्षा उपाय हैं, जिनका पालन अनिवार्य है।