डीटीसी ने माना कि 41 वर्ष पहले यात्री को संवाहक द्वारा पांच पैसे कम की टिकट देने के मामले में वह अब तक करीब 48 हजार रुपये मुकदमे पर खर्च कर चुकी है।
डीटीसी ने स्पष्ट किया कि संवाहक को ऐसे ही कई मामलों में लापरवाही करने के कारण बर्खास्त किया गया था और वह अपने निर्णय पर कायम है। डीटीसी ने यह जानकारी हाईकोर्ट को दी।
न्यायमूर्ति हीमा कोहली के समक्ष पेश डीटीसी के अधिवक्ता ने अदालत के पूछने पर बताया कि वर्ष 1982 से अब तक इस मामले में पर 47 हजार 795 रुपये खर्च हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि संवाहक ने 1973 में यात्री से 15 पैसे के टिकट की अपेक्षा 10 पैसे का टिकट दिया था।