पूजा पाठ के बाद अगर आप फूलमाला समेत पूजन सामग्री को यमुना नदी में प्रवाहित करते आए हैं तो सावधान हो जाइए। अब ऐसा करने पर आपको 5 हजार रुपये का जुर्माना भरना पड़ेगा। यमुना नदी को निर्मल करने के लक्ष्य के मद्देनजर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने मंगलवार को यह सख्त आदेश दिया।
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एनजीटी चेयरमैन जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ के आदेश के मुताबिक यमुना नदी में पूजन सामग्री या किसी भी तरह का कचरा फेंकना प्रतिबंधित होगा और नियम का उल्लंघन करने पर 5 हजार रुपये का जुर्माना देना होगा। इसके अलावा यमुना में निर्माण सामग्री डालने पर 50 हजार रुपये के जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
साथ ही एनजीटी ने अपनी योजना ‘मैली से निर्मल यमुना पुनरुद्धार योजना 2017’ के तहत नदी किनारे किसी भी तरह के निर्माण कार्य पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। यमुना नदी की स्वच्छता के लिए गठित दो समितियों की सिफारिशों को मानते हुए ट्रिब्यूनल ने यह फैसला सुनाया।
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यमुना, हिंडन किनारे निर्माण पर यूपी सरकार की खिंचाई
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने यमुना और हिंडन नदी के किनारे चल रहे निर्माण कार्यों के संबंध में रिपोर्ट दाखिल नहीं करने पर नाराजगी जताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों की खिंचाई की। एनजीटी ने यूपी प्रशासन को 30 जनवरी को पूरी तैयारी के साथ आने को कहा है।
1994 से सफाई पर किसने कितना किया खर्च राज्य--------राशि (करोड़ रुपये) उत्तर प्रदेश---2052 दिल्ली-------2387 हरियाणा------549
22 किमी के सफर में 22 नाले दिल्ली में यमुना 22 किमी का रास्ता तय करती है और इस सफर में 22 नाले नदी में गिरते हैं। पीने की तो छोड़िए, नदी का पानी नहाने लायक तक भी नहीं बचता। निजामुद्दीन और ओखला तक पहुंचते-पहुंचते इसका पानी प्रदूषण के मामले में बेहद खतरनाक रूप ले लेता है।
सी ग्रेड भी नहीं बची यमुना केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में जो रिपोर्ट पेश की है, उसके मुताबिक अगर 100 मिमी पानी में 5000 एमपीएन कॉलिफॉर्म हो, तो इसे पीने योग्य माना जाता है। यमुना दिल्ली में पल्ला के रास्ते प्रवेश करती है, यहां पर इसमें कॉलिफॉर्म की मात्रा पिछले साल 7 जनवरी को 43 हजार रही। इसे ट्रीटमेंट के बाद पीने योग्य बनाया जा सकता है और इसे सी ग्रेड में रखा जा सकता है। मगर निजामुद्दीन तक पहुंचते-पहुंचते कॉलिफॉर्म की मात्रा 5.4 करोड़ हो गई, जबकि कालिंदी कुंज में यह संख्या बढ़कर 16 करोड़ हो गई। मतलब डी ग्रेड।
बड़ा खतरा, औद्योगिक कचरा: रवि चोपड़ा
गंगा आंदोलन से लंबे समय से जुड़े रहे पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट, देहरादून के निदेशक रवि चोपड़ा का मानना है कि नदियों को सबसे ज्यादा खतरा औद्योगिक कचरे से है।
उनका कहना है कि फूल पत्ती जैसे जैवीय कचरे को पचाने की क्षमता तो नदी में होती है, लेकिन औद्योगिक कचरे को पचाना न तो नदी के बस में है और न ही उसमें रहने वाले जीव-जंतुओं के बस में।
इसलिए हमें अपनी प्राथमिकता तय करनी होगी। साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि जब तक नदी में पानी नहीं रहेगा, तब तक उसे निर्मल बनाने के प्रयास प्रभावी नहीं हो पाएंगे।
गंगा मैली की मैली
हजारों करोड़ रुपये, ढेरों समितियां और अब विशेष मंत्रालय। लेकिन गंगा अभी भी मैली की मैली ही है। लाख कोशिशों के बावजूद स्वच्छ व निर्मल गंगा का सपना अभी भी कोसों दूर दिख रहा है।
धर्म नगरी हरिद्वार में ही 3766 मिलियन कचरा रोजाना इस पवित्र नदी में गिरता है। गंगा किनारे बसने वाली करीब 35 करोड़ की आबादी प्रतिदिन 1.3 अरब लीटर मलमूत्र गंगा में उड़ेलती है।
इसके अलावा 60 लाख टन रासायनिक खाद, 9 हजार टन कीटनाशक, 26 करोड़ टन औद्योगिक कचरा और हजारों लाशें भी गंगा को जहरीला बनाने का काम कर रही हैं। केंद्र सरकार के मुताबिक गंगा को फिर से पुराने रूप में लाने के लिए कम से कम 18 साल का समय लगेगा।
यमुना किनारे अवैध निर्माण के मद्देनजर पीठ ने रियल एस्टेट डेवलपर्स को भी नदी किनारे किसी भी तरह का निर्माण करने से रोक दिया है। ‘यमुना जिए अभियान’ के मनोज कुमार मिश्रा की याचिका पर ट्रिब्यूनल ने यह आदेश जारी किया है।
मनोज मिश्रा ने यमुना में कचरा डालने पर प्रतिबंध लगाने और नदी की स्वच्छता सुनिश्चित करने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी।
याचिकाकर्ता मनोज ने आदेश पर संतुष्टि जाहिर करते हुए कहा कि इस तरह के फैसले की बेहद जरूरत थी और हम इसका स्वागत करते हैं। इस फैसले का प्रभाव अन्य राज्यों पर भी पड़ेगा और हम इस आदेश को लागू करने के लिए अपने प्रयास करते रहेंगे।