डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी कोरोना के खिलाफ पहली पंक्ति में खड़े होकर जंग लड़ रहे हैं। उन्होंने कई अतुलनीय काम करके मिसाल कायम की हैं। इन्हीं में एम्स झज्जर के 5 स्वास्थ्य कर्मी भी शामिल हैं, जो 6 महीने में 600 से ज्यादा मरीजों को जीवन दान दे चुके हैं। ये सभी मरीज कोरोना से संक्रमित होने के बाद अस्पताल में भर्ती हुए थे।
एम्स झज्जर के डायलिसिस यूनिट के इंचार्ज और नर्सिंग अधिकारी नंद भंवर सिंह ने बताया कि उनके यहां जून में कोरोना मरीजों का आना शुरू हुआ था। इस दौरान कई रोगियों की किडनी खराब हो गई थी। जान बचाने के लिए उनके तुरंत डायलिसिस की आवश्यकता होती थी। अस्पताल की डायलिसिस यूनिट में महज 5 स्वास्थ्य कर्मचारी हैं। इतनी कम क्षमता के बावजूद इन सभी ने अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाया और जून से नवंबर तक 600 मरीजों का जीवन डायलिसिस कर बचाया।
उन्होंने बताया कि भर्ती होने वाले रोगियों में 50 फ़ीसदी से अधिक आईसीयू और वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे। इनके डायलिसिस में बेहद सावधानी की जरूरत है। नर्सिंग अधिकारी 8 से 10 घंटे तक पीपीई किट पहनकर रखते हैं। डायलिसिस जटिल प्रक्रिया है, जिसमें मरीज की जान को खतरा रहता है। कई बार मरीज का ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। ऐसे में उनके शरीर के सभी अंग खराब हो सकते हैं। इन पांचों स्वास्थ्य कर्मियों ने डायलिसिस के दौरान सभी चीजों का ध्यान रखा। बीते 6 महीने में जितने भी मरीज यूनिट में आए, सभी का सफलतापूर्वक डायलिसिस किया गया।
रोज 14 से 16 घंटे तक करते थे काम
डायलिसिस यूनिट में तैनात नर्सिंग अधिकारी अंकित कुमार बताते हैं कि सिर्फ 5 लोगों का स्टाफ होने के कारण उन्हें रोज ड्यूटी के बाद भी काम करना पड़ता था। कई बार ड्यूटी खत्म होने के बाद मरीज आ जाते थे। डायलिसिस के लिए आने वाले मरीजों में अधिकतर गंभीर स्थिति में होते थे, इसलिए तुरंत उपचार देना जरूरी थी। एक मरीज की डायलिसिस में 6 से 8 घंटे लगते हैं। ऐसे में उन्हें कई बार 14 से 16 घंटे भी काम करना पड़ता था। अंकित बताते हैं कि वे पिछले 6 महीने से इसी तरह काम कर रहे हैं। इस दौरान उनके 3 साथी कोरोना संक्रमित हो गए, लेकिन किसी का हौसला कम नहीं हुआ। सभी ने संक्रमण को मात देने के बाद अपनी ड्यूटी फिर से डायलिसिस यूनिट में ही लगवाई।
समय के साथ परिजनों का डर भी हुआ खत्म
नंद भंवर सिंह बताते हैं कि मार्च के बाद से ही ये पांचों स्वास्थ्य कर्मी घर नहीं गए हैं। सभी अस्पताल परिसर के आसपास ही रहते हैं। संक्रमण की शुरुआत में उनके परिजन काफी डरते थे। समय बीतने के साथ परिजनों का डर भी खत्म हो गया।