अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने अपनी ही 17 वर्षीय बेटी का दस साल तक यौन शोषण करने के आरोपी पिता को जमानत देने से इन्कार कर दिय। अदालत ने कहा कि पीड़िता की मनोवैज्ञानिक स्थिति (डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर और पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) उसके बयान को अविश्वसनीय नहीं बनाती, बल्कि लंबे समय तक चले ट्रॉमा का सबूत है। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने 5 मई को दिए फैसले में पिता की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि आरोपों की गंभीरता, पिता-पुत्री के रिश्ते और आरोपी द्वारा पीड़िता या गवाहों को प्रभावित करने की संभावना को देखते हुए इस चरण में जमानत देना उचित नहीं है। पीड़िता ने आरोप लगाया कि जब वह करीब 6 साल की थी, तब से उसके पिता ने बार-बार उसका यौन शोषण किया। जनवरी में एक घटना के बाद उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर पॉक्सो एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज हुई।
अभियुक्त पिता ने जमानत याचिका में दावा किया कि वह निर्दोष है और उसकी पत्नी से तनावपूर्ण वैवाहिक संबंधों के चलते झूठा फंसाया गया है। अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि पीड़िता के आरोप लंबे समय से चल रही घटनाओं को दर्शाते हैं, न कि किसी एक घटना को।