‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का सिर्फ नारा देने से ही बच्चियों को नहीं बचाया जा सकता। हम समाज के तौर पर बच्चियों को बचाने में नाकाम रहे हैं। यह तल्ख टिप्पणी अदालत ने दो साल की बच्ची की मौत के मामले में उसके पिता और दादी को छह माह कैद की सजा सुनाते हुए की। बच्ची अपने पिता और दादी के साथ ही रहती थी और कुपोषण का शिकार हो गई। दिसंबर 2013 में पति से विवाद के कारण मां उसे पिता के पास छोड़कर चली गई थी।
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कड़कड़डूमा जिला अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश गुरदीप सिंह सैनी ने बच्ची के पिता दीपक पांचाल और दादी उषा को सजा सुनाते हुए कहा कि बच्चियों की अनदेखी आज भी जारी है। हम लोग न केवल माता पिता, बल्कि समाज के तौर पर भी बच्चियों को बचाने में नाकाम रहे हैं।
इस मामले में तो एक पड़ोसी ने बेशर्मी से दोषियों के पक्ष में बयान भी दिया। अदालत ने फैसले में कहा कि बच्ची की देखभाल उसके पिता व दादी उसकी मौत से दो माह पहले से कर रहे थे। इसी दौरान वह कुपोषण का शिकार हुई और उसका वजन केवल 5 किलो रह गया था।
उन दोनों ने उसकी ठीक से देखभाल नहीं की और न ही उसे डॉक्टर के पास लेकर गए। अदालत ने फैसले में बच्ची की मां को भी आड़े हाथ लेते हुए कहा कि बच्ची को न केवल उसके पिता और दादी ने अनदेखा किया, बल्कि मां ने भी उसका ध्यान नहीं रखा और उसे छोड़कर चली गई। वह बच्ची की मौत के बाद न उसे लेने आई और न उसके अंतिम संस्कार में शामिल हुई।
अभियोजन के मुताबिक, बच्ची के पिता दीपक और मां रजनी के बीच वर्ष 2013 से पारिवारिक विवाद था। रजनी ने दीपक के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मुकदमा दायर किया था। उनका समझौता हो गया था, लेकिन दोनों अलग रहने लगे। दीपक पांचाल ने दिसंबर 2013 में बच्ची की कस्टडी ली थी। बच्ची 19 फरवरी 2014 को बेहोश हो गई थी। उसकी दादी उसे अस्पताल लेकर गई, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था।