इसी प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सवाल किया है कि क्या इन कानूनों को किसानों का विरोध समाप्त होने तक स्थगित किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से उत्साहित एक किसान नेता ने उसी शाम हुई बैठक के दौरान किसानों के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर केंद्र सरकार तीनों विवादित कानूनों को स्थगित करने के लिए सहमत हो जाती है तो यह किसानों की बड़ी नैतिक जीत होगी। अब कृषि कानूनों का कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा, इसलिए अब आंदोलन को खत्म करते हुए बाकी की लड़ाई अन्य माध्यमों से लड़ी जा सकती है।
किसान नेता ने कहा कि अगर कानून स्थगित हो जाता है तो बाकी की लड़ाई कानूनी तौर पर और पंजाब विधानसभा चुनावों में मतदान के जरिए लड़ी जा सकती है। उनके मुताबिक इस तरह आंदोलन के कारण लोगों को परेशानी भी नहीं झेलनी पड़ेगी और कानूनों का हल भी निकल जाएगा।
लेकिन उक्त किसान नेता को बाकी किसान नेताओं का भारी विरोध झेलना पड़ा। शेष किसान नेताओं ने कहा कि अब यहां से केवल कृषि बिलों को वापस कराने के बाद ही वापसी की जाएगी। चाहे इसके लिए चार-छः महीने का समय ही क्यों न लग जाए। इस तरह समझौते की बात कहने वाले दो बड़े नेताओं का हश्र देखकर बाकी का कोई नेता भी अब समझौते की बात कहने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहा है।
शहीद किसानों के परिवारों को क्या मुंह दिखाएंगे
किसान नेता ने कहा कि शेष किसानों ने इनका यह कहकर विरोध किया कि अगर आज ही आंदोलन खत्म कर दिया गया तो घर जाकर वे शहीद किसान परिवारों के लोगों को क्या मुंह दिखाएंगे। क्या उन्होंने इसीलिए अपने परिवार के लोगों की कुर्बानी दी है? किसान नेता ने बताया कि इन सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं। यही कारण है कि अब तीनों कानूनों की पूरी तरह वापसी से कम पर किसान नेता कुछ भी स्वीकार करने की स्थिति में नहीं रह गए हैं।