फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

समझौते की बात कहने पर सुननी पड़ी फटकार, किसान साथियों ने कहा- शहीदों के परिवारों को क्या देंगे जवाब

Wed, 23 Dec 2020 11:08 PM IST
संजीव कुमार झा अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
किसानों का आंदोलन - फोटो : पीटीआई
विज्ञापन

केंद्र सरकार के साथ-साथ कई किसान नेता भी अब किसान आंदोलन का हल निकालने की कोशिश कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि 26 नवंबर से चला आ रहा आंदोलन अब खत्म किया जाए। विशेषकर इस बात को ध्यान में रखकर कि सरकार एपीएमसी मंडियों और एमएसपी को जारी रखने का लिखित आश्वासन देने को तैयार हो गई है। लेकिन सच्चाई यह है कि अब कोई भी किसान नेता किसानों की बैठक में तीनों कानूनों की वापसी से कम की बात कहने की भी हिम्मत नहीं कर पा रहा है। दो किसान नेताओं को समझौते की बात कहने के कारण बाकी किसानों की भारी नाराजगी झेलनी पड़ी है।

विज्ञापन


संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल एक बड़े किसान नेता ने कहा कि किसानों के बीच अब ऐसी स्थिति बन गई है कि अब कोई चाहे तो भी वह समझौते की बात नहीं कह पा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जैसे ही कोई किसान नेता समझौते की बात कहता है उसे संगठन में शामिल बाकी किसानों का भारी विरोध झेलना पड़ जाता है। एक किसान नेता को इसी तरह की भारी नाराजगी झेलनी पड़ गई जिसके बाद कोई दूसरा किसान नेता अब इस तरह की बात कहने की भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।

किसान नेता ने अमर उजाला को बताया कि केंद्र सरकार ने पांचवें दौर की बातचीत के बाद किसानों की प्रमुख समस्याओं का एक समाधान पेश कर दिया था। इससे संयुक्त किसान मोर्चा के कुछ किसान संगठन सहमत भी थे। इसी के मद्देनजर पंजाब से जुड़े एक महत्त्वपूर्ण किसान संगठन, जिसने कि आंदोलन की शुरूआत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, के शीर्ष नेता ने कहा कि सरकार हमारी ज्यादातर मांगे मानने के लिए सहमत हो गई है, एपीएमसी और एमएसपी खत्म होने की चिंता अब खत्म हो गई है, इसलिए अब हमें आंदोलन को खत्म करना चाहिए।
विज्ञापन


नेता के मुताबिक, सिंघु बॉर्डर पर हो रही किसानों की इस बैठक में उक्त किसान नेता अपनी पूरी बात कह भी नहीं पाया था कि इसके पहले ही बाकी किसानों ने जोरशोर से इसका विरोध शुरू कर दिया। वे उस किसान नेता को उनकी बात कहने से ही रोकने लगे। हालांकि, संगठन के ही एक अन्य महत्त्वपूर्ण नेता के हस्तक्षेप के बाद उन्हें अपनी बात पूरी करने की अनुमति तो मिल गई, लेकिन उनकी बात पूरी होते ही संगठन के नेताओं ने उनका पुरजोर विरोध किया। इसके बाद तब से वे नेता आज तक आंदोलन खत्म करने की बात दुबारा कहते नहीं देखे गए।

विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद भी उठी थी ये मांग

इसी प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सवाल किया है कि क्या इन कानूनों को किसानों का विरोध समाप्त होने तक स्थगित किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से उत्साहित एक किसान नेता ने उसी शाम हुई बैठक के दौरान किसानों के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर केंद्र सरकार तीनों विवादित कानूनों को स्थगित करने के लिए सहमत हो जाती है तो यह किसानों की बड़ी नैतिक जीत होगी। अब कृषि कानूनों का कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा, इसलिए अब आंदोलन को खत्म करते हुए बाकी की लड़ाई अन्य माध्यमों से लड़ी जा सकती है।

किसान नेता ने कहा कि अगर कानून स्थगित हो जाता है तो बाकी की लड़ाई कानूनी तौर पर और पंजाब विधानसभा चुनावों में मतदान के जरिए लड़ी जा सकती है। उनके मुताबिक इस तरह आंदोलन के कारण लोगों को परेशानी भी नहीं झेलनी पड़ेगी और कानूनों का हल भी निकल जाएगा।

लेकिन उक्त किसान नेता को बाकी किसान नेताओं का भारी विरोध झेलना पड़ा। शेष किसान नेताओं ने कहा कि अब यहां से केवल कृषि बिलों को वापस कराने के बाद ही वापसी की जाएगी। चाहे इसके लिए चार-छः महीने का समय ही क्यों न लग जाए। इस तरह समझौते की बात कहने वाले दो बड़े नेताओं का हश्र देखकर बाकी का कोई नेता भी अब समझौते की बात कहने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहा है।

शहीद किसानों के परिवारों को क्या मुंह दिखाएंगे
किसान नेता ने कहा कि शेष किसानों ने इनका यह कहकर विरोध किया कि अगर आज ही आंदोलन खत्म कर दिया गया तो घर जाकर वे शहीद किसान परिवारों के लोगों को क्या मुंह दिखाएंगे। क्या उन्होंने इसीलिए अपने परिवार के लोगों की कुर्बानी दी है? किसान नेता ने बताया कि इन सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं। यही कारण है कि अब तीनों कानूनों की पूरी तरह वापसी से कम पर किसान नेता कुछ भी स्वीकार करने की स्थिति में नहीं रह गए हैं।  
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें