किसी राजनीतिक दल को अगर एक दिन का भी आंदोलन करना होता है तो इसके लिए महीनों की लंबी तैयारी होती है। भारी मात्रा में पैसा, वाहन, और अगर दल सरकार में है तो सरकारी ताकत का उपयोग किया जाता है। इसके बाद भी राजनीतिक दलों का आंदोलन प्रतीकात्मक ही बनकर रह जाता है। वह इस तरह का प्रभाव नहीं छोड़ पाता जिस तरह किसान आंदोलन ने प्रभाव डाला है। खुद किसान संगठन भी एक-एक नेता के नाम पर अपना अलग-अलग गुट बनाकर चलते रहे हैं। उनमें किसानों के किसी मुद्दे पर कभी इतनी एकजुटता नहीं रही। लेकिन इस आंदोलन में सबने अपने-अपने अहम पीछे छोड़कर गजब की एकता दिखाई है।
आखिर इस आंदोलन में ऐसा क्या है कि सब अपने अहम को पीछे छोड़ एकजुट हो गए? किसी आंदोलन का नेतृत्व कर चुके किसी नेता के बिना यह आंदोलन इतनी सफलतापूर्वक कैसे चल रहा है? विशेषज्ञ कहते हैं कि इस आंदोलन से निकला पाठ राजनीतिक दलों, मैनेजमेंट, राजनीति विज्ञान और समाज शाास्त्र के छात्रों के लिए शोध का विषय है। उन्हें इस आंदोलन से सीखना चाहिए कि किसी बड़े कार्य, आंदोलन को सफल बनाने के लिए समाज की ताकत का किस तरह उपयोग किया जा सकता है।
कहां से आ रहा है पैसा
इतने लंबे समय से चल रहे आंदोलन के लिए पैसा कहां से आ रहा है, यह बड़ा सवाल है क्योंकि बिना पैसे के तो इतना बड़ा आंदोलन चला पाना संभव नहीं हो सकता। सरकार के कुछ लोग आरोप लगा रहे हैं कि इस आंदोलन के लिए खालिस्तानी विद्रोहियों और अन्य देश विरोधी ताकतों से पैसा आ रहा है। हालांकि इस तथ्य की पुष्टि के लिए उनके पास किसी तरह के प्रमाण नहीं हैं।
लेकिन इस सवाल का सबसे सटीक जवाब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मिल सकता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के बूढ़ा तालाब नामक स्थान पर किसानों का आंदोलन जारी है। वे भी पूरे देश के किसानों की तरह सरकार से तीनों विवादित कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।
यहां के किसान आंदोलनकारी तेजराम विद्रोही अमर उजाला को बताते हैं कि उनके राज्य के किसान पंजाब के किसानों की तरह धनी और समर्थ नहीं हैं। वे आंदोलन की शुरूआत से यह जानते थे कि उन्हें कहीं से बड़ी फंडिंग नहीं हो सकती है। लिहाजा आंदोलन को सफल बनाने के लिए उन्होंने दूसरी रणनीती अपनाई।
किसानों का एक दल सुबह गृहस्थ परिवारों में घर-घर जाकर चावल मांगता है, जबकि किसानों का दूसरा दल नौकरी पेशा लोगों से अपने वेतन का एक फीसद हिस्सा स्वेच्छा से दान देने की अपील करता है। ज्यादातर लोगों को किसानों से सहानुभूति है और लोग स्वेच्छा और सामर्थ्य के अनुसार दान दे रहे हैं। इन्हीं पैसों से आंदोलन लगातार चल रहा है। किसान समाज में जीता है। अब इसी समाज की ताकत को उसने अपनी ताकत बना ली है।
मध्यप्रदेश के किसान नेता डॉक्टर सुनीलम (ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति के सदस्य) बताते हैं कि किसानों के आंदोलन की इस सफलता का सबसे बड़ा राज यही है कि यहां लड़ रहा हर व्यक्ति यह जानता है कि यह उसकी अपनी लड़ाई है।
किसानों को लगता है कि अगर वे आज नहीं खड़े हुए तो उनके साथ-साथ उनकी आगे आने वाली पीढ़ियों का भविष्य हमेशा के लिए दांव पर लग जाएगा। अगर इन कानूनों के सहारे प्राइवेट कंपनियां खेती में भी घुस जाएंगी तो उनका जीवन हमेशा के लिए संकट में फंस जाएगा। यह उद्देश्य ही उन्हें एक साथ आने और साथ ल़ड़ने की प्रेरणा दे रहा है।
राजनीतिक आंदोलनों में इतनी ईमानदारी होना संभव नहीं