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आंदोलन मैनेजमेंट से देश को लोकतंत्र का असली पाठ पढ़ा रहे किसान, क्या कुछ सीखने को तैयार हैं राजनीतिक दल?

अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संजीव कुमार झा Updated Sun, 20 Dec 2020 11:08 PM IST
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किसान का आंदोलन - फोटो : amar ujala

किसी राजनीतिक दल को अगर एक दिन का भी आंदोलन करना होता है तो इसके लिए महीनों की लंबी तैयारी होती है। भारी मात्रा में पैसा, वाहन, और अगर दल सरकार में है तो सरकारी ताकत का उपयोग किया जाता है। इसके बाद भी राजनीतिक दलों का आंदोलन प्रतीकात्मक ही बनकर रह जाता है। वह इस तरह का प्रभाव नहीं छोड़ पाता जिस तरह किसान आंदोलन ने प्रभाव डाला है। खुद किसान संगठन भी एक-एक नेता के नाम पर अपना अलग-अलग गुट बनाकर चलते रहे हैं। उनमें किसानों के किसी मुद्दे पर कभी इतनी एकजुटता नहीं रही। लेकिन इस आंदोलन में सबने अपने-अपने अहम पीछे छोड़कर गजब की एकता दिखाई है।

आखिर इस आंदोलन में ऐसा क्या है कि सब अपने अहम को पीछे छोड़ एकजुट हो गए? किसी आंदोलन का नेतृत्व कर चुके किसी नेता के बिना यह आंदोलन इतनी सफलतापूर्वक कैसे चल रहा है? विशेषज्ञ कहते हैं कि इस आंदोलन से निकला पाठ राजनीतिक दलों, मैनेजमेंट, राजनीति विज्ञान और समाज शाास्त्र के छात्रों के लिए शोध का विषय है। उन्हें इस आंदोलन से सीखना चाहिए कि किसी बड़े कार्य, आंदोलन को सफल बनाने के लिए समाज की ताकत का किस तरह उपयोग किया जा सकता है।



कहां से आ रहा है पैसा
इतने लंबे समय से चल रहे आंदोलन के लिए पैसा कहां से आ रहा है, यह बड़ा सवाल है क्योंकि बिना पैसे के तो इतना बड़ा आंदोलन चला पाना संभव नहीं हो सकता। सरकार के कुछ लोग आरोप लगा रहे हैं कि इस आंदोलन के लिए खालिस्तानी विद्रोहियों और अन्य देश विरोधी ताकतों से पैसा आ रहा है। हालांकि इस तथ्य की पुष्टि के लिए उनके पास किसी तरह के प्रमाण नहीं हैं।

लेकिन इस सवाल का सबसे सटीक जवाब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मिल सकता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के बूढ़ा तालाब नामक स्थान पर किसानों का आंदोलन जारी है। वे भी पूरे देश के किसानों की तरह सरकार से तीनों विवादित कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

यहां के किसान आंदोलनकारी तेजराम विद्रोही अमर उजाला को बताते हैं कि उनके राज्य के किसान पंजाब के किसानों की तरह धनी और समर्थ नहीं हैं। वे आंदोलन की शुरूआत से यह जानते थे कि उन्हें कहीं से बड़ी फंडिंग नहीं हो सकती है। लिहाजा आंदोलन को सफल बनाने के लिए उन्होंने दूसरी रणनीती अपनाई।

किसानों का एक दल सुबह गृहस्थ परिवारों में घर-घर जाकर चावल मांगता है, जबकि किसानों का दूसरा दल नौकरी पेशा लोगों से अपने वेतन का एक फीसद हिस्सा स्वेच्छा से दान देने की अपील करता है। ज्यादातर लोगों को किसानों से सहानुभूति है और लोग स्वेच्छा और सामर्थ्य के अनुसार दान दे रहे हैं। इन्हीं पैसों से आंदोलन लगातार चल रहा है। किसान समाज में जीता है। अब इसी समाज की ताकत को उसने अपनी ताकत बना ली है।
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मध्यप्रदेश के किसान नेता डॉक्टर सुनीलम (ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति के सदस्य) बताते हैं कि किसानों के आंदोलन की इस सफलता का सबसे बड़ा राज यही है कि यहां लड़ रहा हर व्यक्ति यह जानता है कि यह उसकी अपनी लड़ाई है।

किसानों को लगता है कि अगर वे आज नहीं खड़े हुए तो उनके साथ-साथ उनकी आगे आने वाली पीढ़ियों का भविष्य हमेशा के लिए दांव पर लग जाएगा। अगर इन कानूनों के सहारे प्राइवेट कंपनियां खेती में भी घुस जाएंगी तो उनका जीवन हमेशा के लिए संकट में फंस जाएगा। यह उद्देश्य ही उन्हें एक साथ आने और साथ ल़ड़ने की प्रेरणा दे रहा है।
राजनीतिक आंदोलनों में इतनी ईमानदारी होना संभव नहीं

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किसान का आंदोलन - फोटो : amar ujala
किसी राजनीतिक दल को अगर एक दिन का भी आंदोलन करना होता है तो इसके लिए महीनों की लंबी तैयारी होती है। भारी मात्रा में पैसा, वाहन, और अगर दल सरकार में है तो सरकारी ताकत का उपयोग किया जाता है। इसके बाद भी राजनीतिक दलों का आंदोलन प्रतीकात्मक ही बनकर रह जाता है। वह इस तरह का प्रभाव नहीं छोड़ पाता जिस तरह किसान आंदोलन ने प्रभाव डाला है। खुद किसान संगठन भी एक-एक नेता के नाम पर अपना अलग-अलग गुट बनाकर चलते रहे हैं। उनमें किसानों के किसी मुद्दे पर कभी इतनी एकजुटता नहीं रही। लेकिन इस आंदोलन में सबने अपने-अपने अहम पीछे छोड़कर गजब की एकता दिखाई है।

आखिर इस आंदोलन में ऐसा क्या है कि सब अपने अहम को पीछे छोड़ एकजुट हो गए? किसी आंदोलन का नेतृत्व कर चुके किसी नेता के बिना यह आंदोलन इतनी सफलतापूर्वक कैसे चल रहा है? विशेषज्ञ कहते हैं कि इस आंदोलन से निकला पाठ राजनीतिक दलों, मैनेजमेंट, राजनीति विज्ञान और समाज शाास्त्र के छात्रों के लिए शोध का विषय है। उन्हें इस आंदोलन से सीखना चाहिए कि किसी बड़े कार्य, आंदोलन को सफल बनाने के लिए समाज की ताकत का किस तरह उपयोग किया जा सकता है।

कहां से आ रहा है पैसा
इतने लंबे समय से चल रहे आंदोलन के लिए पैसा कहां से आ रहा है, यह बड़ा सवाल है क्योंकि बिना पैसे के तो इतना बड़ा आंदोलन चला पाना संभव नहीं हो सकता। सरकार के कुछ लोग आरोप लगा रहे हैं कि इस आंदोलन के लिए खालिस्तानी विद्रोहियों और अन्य देश विरोधी ताकतों से पैसा आ रहा है। हालांकि इस तथ्य की पुष्टि के लिए उनके पास किसी तरह के प्रमाण नहीं हैं।

लेकिन इस सवाल का सबसे सटीक जवाब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मिल सकता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के बूढ़ा तालाब नामक स्थान पर किसानों का आंदोलन जारी है। वे भी पूरे देश के किसानों की तरह सरकार से तीनों विवादित कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

यहां के किसान आंदोलनकारी तेजराम विद्रोही अमर उजाला को बताते हैं कि उनके राज्य के किसान पंजाब के किसानों की तरह धनी और समर्थ नहीं हैं। वे आंदोलन की शुरूआत से यह जानते थे कि उन्हें कहीं से बड़ी फंडिंग नहीं हो सकती है। लिहाजा आंदोलन को सफल बनाने के लिए उन्होंने दूसरी रणनीती अपनाई।

किसानों का एक दल सुबह गृहस्थ परिवारों में घर-घर जाकर चावल मांगता है, जबकि किसानों का दूसरा दल नौकरी पेशा लोगों से अपने वेतन का एक फीसद हिस्सा स्वेच्छा से दान देने की अपील करता है। ज्यादातर लोगों को किसानों से सहानुभूति है और लोग स्वेच्छा और सामर्थ्य के अनुसार दान दे रहे हैं। इन्हीं पैसों से आंदोलन लगातार चल रहा है। किसान समाज में जीता है। अब इसी समाज की ताकत को उसने अपनी ताकत बना ली है।

मध्यप्रदेश के किसान नेता डॉक्टर सुनीलम (ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति के सदस्य) बताते हैं कि किसानों के आंदोलन की इस सफलता का सबसे बड़ा राज यही है कि यहां लड़ रहा हर व्यक्ति यह जानता है कि यह उसकी अपनी लड़ाई है।

किसानों को लगता है कि अगर वे आज नहीं खड़े हुए तो उनके साथ-साथ उनकी आगे आने वाली पीढ़ियों का भविष्य हमेशा के लिए दांव पर लग जाएगा। अगर इन कानूनों के सहारे प्राइवेट कंपनियां खेती में भी घुस जाएंगी तो उनका जीवन हमेशा के लिए संकट में फंस जाएगा। यह उद्देश्य ही उन्हें एक साथ आने और साथ ल़ड़ने की प्रेरणा दे रहा है।
राजनीतिक आंदोलनों में इतनी ईमानदारी होना संभव नहीं

आंदोलन में जबरदस्ती बांधकर नहीं लाया गया

दो बार विधायक रह चुके सुनीलम बताते हैं कि राजनीतिक आंदोलनों में इतनी ईमानदारी संभव नहीं होती। हर कार्यकर्ता अपने एक राजनीतिक लालच में आदेशों का पालन करता है। वह यह भी देख रहा हैे कि एक दल का नेता कभी भी पासा पलटकर किसी दूसरे दल में दिखने लग जाता है। यही कारण है कि कार्यकर्ताओं को भी अपने नेताओं में शत प्रतिशत भरोसा नहीं होता। लेकिन इस किसान आंदोलन में शामिल हर व्यक्ति की यह अपनी लड़ाई है।

यहां किसी को जबरदस्ती बांधकर नहीं लाया गया है जैसा कि राजनीतिक कार्यक्रमों में होता है। यही कारण है कि इस आंदोलन में शामिल हर चेहरे पर ईमानदारी दिखती है जो राजनीतिक कार्यक्रमों में किराए पर लाए गए भीड़ के चेहरे पर नहीं दिख सकती।

समाज की ताकत का सबसे बड़ा योगदान
हरियाणा के किसान नेता सुमित दलाल (अखिल भारतीय किसान सभा के हरियाणा महासचिव) अमर उजाला को बताते हैं कि वे रोहतक के रहने वाले हैं। उनका एक दल सिंधु बॉर्डर पर आंदोलन के लिए गया है। जैसे ही दल को किसी सामान की आवश्यकता होती है, वे सूचना दे देते हैं। यहां से आसपास के किसानों से कहकर उतनी व्यवस्था करवा दी जाती है।

लक़ड़ी की व्यवस्था हो या खाद्य सामग्री की, सिंधु बॉर्डर से खबर आते ही समाज के लोगों तक यह संदेश पहुंचा दिया जाता है। इसके बाद जिस व्यक्ति के पास उस सामान की उपलब्धता होती है, वह स्वयं आकर इसे पहुंचा जाता है। अगर धन की मांग होती है तो आपस में सबसे मिलकर धन इकट्ठा कर लिया जाता है। इस प्रकार किसी एक संगठन या व्यक्ति पर भार नहीं पड़ता और आंदोलन चलता रहता है।
स्वतंत्रता आंदोलन से मिल रही ताकत

समाज विज्ञानी और अर्थशास्त्री आदर्श शर्मा मानते हैं कि इस किसान आंदोलन की सफलता की जड़ों की तलाश हमें स्वतंत्रता आंदोलन और उससे भी पहले मुगलों के आक्रमण काल तक ले जाती हैं। पंजाब प्रांत के इस इलाके के लोगों के खून में संघर्ष कूट-कूट कर भरा है। इस समाज के स्त्री-पुरूष और बच्चों तक ने आक्रमण की विभीषिका को झेला है। लिहाजा इस तरह के किसी आंदोलन में वे एकजुट होकर लड़ने के लिए तैयार रहते हैं। 

पंजाब की जत्थेबंदियां इतिहास में इसी तरह समाज का साथ लेकर विदेशी ताकतों और आक्रमणकारियों से लोहा लेती रही हैं। कई बार उन्होंने बेहद कम संख्या में होते हुए भी इन्होंने हजारों की फौजों को हराया है। उनके अवचेतन मस्तिष्क में स्थित संंघर्ष का यही भाव उन्हें आज भी लगातार लड़ने की प्रेरणा दे रहा है।
अगर इतिहास की इस पृष्ठभूमि में देखें तो हमें यह बात आसानी से समझ आ जाएगी कि छोटी-छोटी बात पर अहम पालने वाले किसान संगठन आज अचानक एकजुट होकर इस कानून से लड़ने के लिए एकजुट क्यों हो गए हैं?

बिना नेतृत्व आंदोलन इतना सफल कैसे

किसी भी आंदोलन में एक नेतृत्व होता है जिसके आदेशों पर आंदोलन की पूरी रणनीति तय की जाती है। राजनीतिक मामलों में नेताओं के पास आंदोलन का अच्छा-खासा अनुभव होता है, लेकिन इस आंदोलन को देखें तो योगेंद्र यादव सहित कुछ बड़े चेहरे अवश्य हैं, लेकिन इनके पास भी आंदोलनों को नेतृत्व करने का कोई बड़ा अनुभव नहीं है। ऐसे में यह आंदोलन इतना सफल कैसे हो रहा है।

इस सवाल के जवाब में सुनीलम कहते हैं कि किसानों के आंदोलन स्वतंत्रतापूर्व काल से ही इसी प्रकार शुरू होते रहे हैं। हालांकि चंपारण की तरह बाद में महात्मा गांधी की तरह बड़े लोगों ने इन्हें नेतृत्व अवश्य प्रदान किया है। यह आंदोलन भी लगभग उसी तरह चल रहा है। यहां का हर व्यक्ति समझ रहा है कि उसकी जिम्मेदारी क्या है और इसी की वजह से यह आंदोलन लगातार चल रहा है और अपने उद्देश्य में सफल है।
निर्णय पर ईमानदारी
 

निर्णयों के प्रति विश्वास

राजनीतिक संगठनों में किसी एक या दो नेताओं पर निर्णय की पूरी जिम्मेदारी होती है। इन नेताओं की निष्ठा पर्दे के पीछे बदल जाए, इस पर शक करना कोई बड़ी बात नहीं है। अक्सर नेताओं को पर्दे के पीछे बड़ी डील करने के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन इस आंदोलन में लगभग 32 से 50 किसान नेताओं का एक समूह कोई भी निर्णय ले रहा है। लिहाजा किसी निर्णय पर संदेह करने की कोई जगह नहीं बच रही है। निर्णयों के प्रति यह विश्वास भी इस आंदोलन को सफल बनाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है।

सही मायनों में किसी राजनीतिक दल में भी निर्णय की प्रक्रिया किसी एक-दो व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। अगर इसी प्रकार पार्टी के शीर्ष नेताओं का एक समूह निर्णय ले तो इससे राजनीतिक शुचिता ज्यादा मजबूत होगी। कार्यकर्ताओं का नेतृत्व में विश्वास बढ़ेगा और जनता का लोकतंत्र मेें विश्वास बढ़ेगा। लेकिन दुर्भाग्य से भारत का एक भी राजनीतिक दल इस बात का दावा नहीं कर सकता कि उसकी पार्टी में लोकतंत्र के अनुसार निर्णय लिया जाता है।

मैनेजमेंट की अद्भुत मिसाल
यूपी बॉर्डर पर 27 नवंबर से हजारों किसान आंदोलन के लिए डटे हैं। यहां लगभग एक दर्जन लंगर दिनरात चल रहे हैं। किसानों के साथ-साथ यहां आने वाला हर व्यक्ति लंगर की सेवा ले रहा है। सुरक्षा में खड़े जवान भी इन्हीं लंगरों से चाय-पानी प्राप्त कर रहे हैं। लेकिन इतने लोगों के भोजन में कभी कोई देर नहीं होती। चाय से लेकर दोपहर और रात का भोजन सबको उपलब्ध होता है। इन लंगरों का मैनेजमेंट करने के लिए कहीं से कोई आदेश नहीं देता, लेकिन जरूरत सबकी पूरी होती रहती है। मैनेजमेंट के इस अद्भुत तरीके को देखकर लोग हैरान हैं।

गुरुद्वारा बांग्लासाहिब के लंगर के एक सेवादार हरप्रीत सिंह बताते हैं कि गुरूद्वारे की तरफ से लगभग सौ सेवादार यहां नियुक्त किए गए हैं। लेकिन सबसे बड़ा सहयोग इस इलाके के आसपास इंदिरापुरम, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, खोड़ा और गाजियाबाद के लोग दे रहे हैं। यहां के सिख परिवारों की बहुएं, बेटियां, बच्चे अपने कार्य से निवृत्त होकर सेवा करने चले आते हैं और सारा जरूरी कामकाज निबटा जाते हैं। उनकी सेवा से बड़ी मदद मिलती है। इसी प्रकार से 24 दिनों से लोगों की सेवा की जा रही है।

प्रतिदिन कितने लोग लंगर से भोजन प्राप्त कर रहे हैं, इसकी ठीक-ठीक जानकारी सेवादारों को भी मालूम नहीं है। क्योंकि लंगर दिनरात चलता रहता है और भोजन बनता रहता है। जिसे आवश्यकता होती है, वह आकर भोजन ग्रहण करता जाता है।
इस आंदोलन के जरिए किसानों ने देश की जनता को लोकतंत्र का जो पाठ पढ़ाया है, उस पर गौरपूर्वक विचार किया जाना चाहिए। 
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