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Faridabad News: सात सौ साल पुरानी कला को आज भी रखा है जीवित

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फरीदाबाद। जम्मू-कश्मीर के कारीगरों ने लगभग 700 साल पुरानी पेपरमेशी कला को आज भी जीवित रखा है। यहां की पेपरमेशी की चीजों की मांग ब्रिटेन जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों में है। जम्मू कश्मीर में अधिकांश लोग पेपरमेशी का काम करते हैं।
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अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प सूरजकुंड मेले में स्टॉल नंबर 1261 पर मौजूद इकबाल हुसैन खान ने बताया कि पेपरमेशी एक प्राचीन शिल्प कला है। इसका इस्तेमाल करके विभिन्न तरह के मुखौटे, खिलौने और कलाकृतियां तैयार की जाती हैं। यह पेपर लुगदी से बनी एक निर्माण सामग्री है, जिसमें अखबार या अपशिष्ट पेपर, मुल्तानी मिट्टी, मेथी पाउडर, गोंद और पानी का इस्तेमाल किया जाता है। पेपर को करीब एक सप्ताह तक भिगोकर रखा जाता है। फिर इसका पेस्ट तैयार किया जाता है। इन्हें अलग-अलग डिजाइन में तैयार करके धूप में कम से कम दो दिनों तक सुखाया जाता है। अंत में इसपर चित्रकारी की जाती है।


तीन बार हो चुके हैं सम्मानित
इकबाल हुसैन ने बताया कि लगभग आठ वर्षों से सूरजकुंड मेले में आ रहे हैं। मेले में लोगों से बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। देशी से लेकर विदेशी पर्यटक कागज से बनी चीजों को पसंद कर रहे हैं। कागज से तैयार किया गया हाथी लोगों को खूब लुभा रहा है। इसकी कीमत करीब एक लाख रुपये है। इकबाल ने अपने पिता से यह कला सीखी है। उन्हें इसके लिए साल 2003 में मेरिट नेशनल, 2007 में नेशनल और 2019 में शिल्प गुरु सम्मान भी मिल चुका है। कोरोना महामारी के दौरान कारोबार पर असर हुआ। लेकिन जैसे-जैसे हालात बदलते गए कामकाज पटरी पर आ गया।
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