कोर्ट ने दो माह का वेतन देने का आदेश देते हुए कंपनी की कार्रवाई को गलत बताया
सचिन कुमार
फरीदाबाद। जिला अदालत ने वेतन विवाद के मामले में बिना नोटिस दिए नौकरी से सेवामुक्त करने को गलत बताते हुए कंपनी को दो माह का वेतन देने का आदेश दिया है। हालांकि कोर्ट ने नो वर्क, नो पे का सिद्धांत भी लागू रखने को कहा है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश संदीप गर्ग की अदालत ने 20 अप्रैल को सुनील कुमार अग्रवाल बनाम प्रियंका निगम मामले में नियोक्ता की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए पहले दिए गए आदेश में संशोधन किया।
मामले के अनुसार, प्रियंका निगम कंपनी में कार्यकारी कानूनी एवं सचिव के पद पर कार्यरत थीं। उन्होंने अप्रैल 2025 में परीक्षा की तैयारी के लिए अवकाश लिया और 10 जून 2025 को दोबारा काम जॉइन करने पहुंचीं। आरोप था कि नियोक्ता ने उन्हें काम पर नहीं लिया और एक जुलाई 2025 को बिना किसी नोटिस के सेवा समाप्त कर दी।
इस पर प्रियंका निगम ने वेतन भुगतान प्राधिकरण में दावा दायर किया, जहां उनके पक्ष में फैसला देते हुए कुल 57 हजार रुपये देने का आदेश दिया गया था। इसमें 10 जून से 30 जून तक का वेतन, दो माह का नोटिस पीरियड वेतन और मुआवजा शामिल था। नियोक्ता ने इस आदेश को जिला अदालत में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि नियोक्ता यह साबित नहीं कर सका कि कर्मचारी ने खुद नौकरी छोड़ी थी। ऐसे में अदालत ने माना कि सेवा बिना नोटिस समाप्त की गई, इसलिए दो माह का वेतन देना जरूरी है।
हालांकि अदालत ने यह भी पाया कि 10 जून से 30 जून के बीच कर्मचारी ने काम नहीं किया। इस आधार पर नो वर्क, नो पे सिद्धांत लागू करते हुए 14 हजार रुपये की राशि वेतन से काट दी गई। अदालत ने संशोधित आदेश में कर्मचारी को 40 हजार रुपये नोटिस वेतन और तीन हजार रुपये मुआवजा, कुल 43 हजार रुपये देने का निर्देश दिया।