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Faridabad News: बदलते दौर में दर्शकों की कमी बड़ी चुनौती

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हिंदी रंगमंच दिवस: समय के साथ लोगों की सोच भी बदली
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पुरानी शैली में नाटक लिखे होने के कारण नहीं हो पा रहा लोगों से जुड़ाव
सूरज कुमार
फरीदाबाद। हिंदी रंगमंच दिवस के मौके पर एक तरफ इसकी समृद्ध परंपरा को याद किया जा रहा है, तो दूसरी ओर वर्तमान हालात चिंता बढ़ाने वाले हैं। डिजिटल दौर में थिएटर को दर्शकों की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
आज के समय में लोगों की पहली पसंद सोशल मीडिया बन गया है, जहां वे अपना अधिक समय बिताते हैं। इसका सीधा असर रंगमंच पर देखने को मिल रहा है। शहर के रंगकर्मियों का कहना है कि समय के साथ लोगों की सोच और समस्याएं बदल गई हैं, लेकिन हिंदी नाटक अब भी पुरानी शैली में लिखे और प्रस्तुत किए जा रहे हैं। इसी वजह से आम दर्शक उनसे जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते। कलाकारों का मानना है कि अगर नाटकों में नए विषय और युवाओं से जुड़े मुद्दे शामिल किए जाएं, तो रंगमंच को फिर से जीवंत बनाया जा सकता है। साथ ही, कई रंगकर्मी नए प्रयोग करने से बचते हैं और आज भी शेक्सपीयर जैसे पुराने लेखकों के नाटकों पर निर्भर रहते हैं। लेखकों और कलाकारों का यह भी कहना है कि मोहन राकेश और धर्मवीर भारती जैसे महान लेखकों का दौर अब बीत चुका है। ऐसे में जरूरी है कि आज के मुद्दों को मंच पर लाया जाए, ताकि युवा दर्शक खुद को उससे जोड़ सकें और थिएटर की ओर आकर्षित हों।
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कोट्स


मैं 20 वर्षों से रंगमंच से जुड़ा हूं। शहर में दर्शकों की कमी नहीं है, बल्कि जरूरत नए विषयों और सरल भाषा में नाटक प्रस्तुत करने की है। हाल ही में केएल मेहता कॉलेज में मंचित नाटक टेम्पोरेरी तुम, पर्मानेंट हम का लेखन भी किया। -डॉ. अंकुश शर्माऑनलाइन माध्यम के बढ़ते प्रभाव ने थिएटर को प्रभावित किया है। आज के दर्शकों में धैर्य कम हो गया है और वे जल्दी मनोरंजन चाहते हैं। उन्होंने पुराने समय को रंगमंच का स्वर्णकाल बताया। -आनंद भाटी, निर्देशक
प्रशासन को रंगमंच को बढ़ावा देने के लिए आगे आना चाहिए, ताकि लोगों की रुचि बढ़े। इस समय कलाकारों को प्रशासन के सहयोग की आवश्यकता है। -नरेश ठाकुर, निर्देशक
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शहर के सभी कलाकार लगातार प्रयास कर रहे हैं कि शहर में ही अच्छे नाटक प्रस्तुत किए जाएं, ताकि लोगों को थिएटर देखने के लिए बाहर न जाना पड़े। -अभिषेक ठाकुर, युवा कलाकार
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