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Faridabad News: मिट्टी के बर्तनों की मांग में इजाफा, छोटे व्यापारियों की बढ़ी उम्मीदें

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ग्राहक परंपरागत वस्तुओं को दे रहे हैं प्राथमिकता, मिट्टी के मटके, कुल्हड़ व दीयों को खरीदने के लिए लग रही भीड़
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संवाद न्यूज एजेंसी।

फरीदाबाद। दिवाली के नजदीक आते ही शहर के बाजारों में पारंपरिक हस्तनिर्मित वस्तुओं की मांग तेजी से बढ़ रही है। जहां एक ओर सजावटी लाइटें और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की चकाचौंध है। वहीं, दूसरी ओर लोगों का झुकाव फिर से मिट्टी के बर्तनों और देसी दीयों की ओर लौटता दिख रहा है। यह रुझान न केवल भारतीय परंपरा के प्रति लगाव को दर्शाता है, बल्कि स्थानीय कारीगरों और छोटे व्यापारियों के लिए नई उम्मीद भी लेकर आया है।

एनआईटी-पांच मार्केट में मिट्टी के बर्तन बेचने वाले प्रमोद जैसे कुम्हार इन दिनों खासे व्यस्त हैं। सड़क किनारे लगी उनकी छोटी-सी दुकान पर शाम से रात तक ग्राहकों की भीड़ लगी रहती है। प्रमोद ने बताया कि इस बार अहोई अष्टमी से ही बिक्री में तेजी आने लगी थी। जैसे-जैसे दिवाली नजदीक आ रही है, मांग लगातार बढ़ रही है। मिट्टी के मटके, कुल्हड़, दीये और छोटी सजावटी वस्तुएं खूब बिक रही हैं।
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प्रमोद के मुताबिक इस साल मिट्टी के बर्तनों के दाम में थोड़ी बढ़ोतरी जरूर हुई है, लेकिन ग्राहक परंपरागत वस्तुओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि 15 लीटर की क्षमता वाले बड़े मटके 150 रुपये, आठ लीटर वाले मध्यम मटके 80 रुपये और पांच लीटर क्षमता वाले छोटे मटके 50 रुपये में बिक रहे हैं। वहीं, मिट्टी के दीयों की थोक कीमत 800 रुपये प्रति हजार है। उन्होंने बताया कि दिवाली से एक दिन पहले तक दीयों की बिक्री चरम पर पहुंच जाती है। ग्राहक सुबह से ही आना शुरू हो जाते हैं।

मार्केट में ही मिट्टी के बर्तन के अन्य कारोबारी ने बताया कि हमारा पूरा परिवार इस काम से जुड़ा है। यह हमारा पुश्तैनी काम है। पहले के मुकाबले लागत और मेहनत और दोनों बढ़ी है।
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स्थानीय बाजारों में इस बार हस्तनिर्मित उत्पादों को लेकर एक नई चेतना देखने को मिल रही है। शहर के कई ग्राहक भी मानते हैं कि दीयों की रोशनी तभी पूरी लगती है, जब वे मिट्टी के बने हों। मार्केट में खरीदारी करने आईं कनकलता ने बताया कि वह दिवाली पर मिट्टी के बने दीयों का ही उपयोग करती हैं। उन्होंने कहा कि मिट्टी के बने दीये पर्यावरण के अनुकूल होते हैं।
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