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Faridabad News: अपनों की बेरुखी और अकेलेपन के दर्द से नम हो जाती हैं आखें

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एनआईटी-2 स्थित ताऊ देवीलाल वृद्धाश्रम में रही रहीं बुजुर्ग महिलाओं ने कहा- बच्चों के जीवन में बहुत संघर्ष किया
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भारती दुबे
फरीदाबाद। मां प्यार, त्याग और समर्पण की मूर्ति हैं। लोग मां के प्यार के लिए तरसते हैं, फोन में उनकी फोटो स्टेटस पर लगाते हैं। लेकिन अब भी कई माताएं वृद्धाश्रम में रहती हैं। जिनमें कुछ माताएं ऐसी हैं, जिन्हें ठीक से सुनाई और दिखाई भी नहीं देता।
जिनकी आंखें अपनों की बेरुखी और अकेलेपन के दर्द से नम है। अमर उजाला की टीम ने मातृ दिवस के अवसर पर एनआईटी-2 स्थित ताऊ देवीलाल वृद्धाश्रम में पहुंचकर बुजुर्ग महिलाओं से बातचीत की। यहां कई मां बहुत निराश दिखीं। उनकी आखों में अपनी आपबीती बताते हुए आंसू नहीं रुके। बुजुर्ग महिलाओं ने बताया कि उन्होंने अपने बच्चों के लिए अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया, लेकिन उनके बच्चों ने उनकी कदर नहीं की। उन्हें यह सब देखकर बहुत दुख होता है।
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बुजुर्ग से बातचीत

मैं पिछले नौ महीनों से वृद्धाश्रम में रह रही हूं। कुछ समय पहले मेरे पति और बेटे का निधन हो गया। उसके बाद मेरी बहू ने ना केवल मुझे घर से निकाला बल्कि मेरी सारी जमा पूंजी भी हड़प ली। मुझे आंखों से दिखाई नहीं देता। किसी अनजान व्यक्ति ने मुझे वृद्धाश्रम में छोड़ दिया। मैंने अपना पूरा जीवन अपनी खुशियों को त्याग कर बच्चों की खुशियों में निकाल दिया। लेकिन बेटे की मौत के बाद बहु ने मुझे सड़क पर अकेला छोड़ दिया। - देवकी



शादी के बाद मेरी कोई संतान नहीं हुई। मैं चाहती थी मेरी भी संतान हो और मैं उसके साथ खुश रहूं। मेरे पति के गुजर जाने के बाद मैं बिल्कुल अकेली हो गई। जिसके बाद मुझे किसी ने वृद्धाश्रम छोड़ दिया। मेरी उम्र 58 वर्ष है। यहां आकर मैंने देखा कि यहां ऐसी कई मां हैं जिनके अपने बच्चे होते हुए भी उन्हें घर से निकाल दिया और इस वृद्धाश्रम में शरण लेने पर मजबूर हैं। - सुरेंद्र



मेरी उम्र 80 साल से अधिक है, ये बताकर मुझे बहुत दुःख होता है कि मेरा बेटा झूठ बोलकर मुझे यहां छोड़ गया कि मैं उसे सड़क पर कहीं मिली थी। मैंने जीवन में अपने बेटे की परवरिश में कोई कमी नहीं छोड़ी, मैंने उसके लिए बहुत संघर्ष किया। लेकिन मेरा बेटा और पोता होते हुए भी मुझे यहां आश्रम में रहना पड़ रहा है, इससे बड़े दुख की बात मेरे लिए और कुछ नहीं है। -
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दया देवी



शराब की लत से मेरे पति और दोनों बेटों की मौत हो गई। जिनके इलाज में मेरी सारी जमा पूंजी खत्म हो गई और मेरा घर तक बिक गया। मेरी बहु ने भी मुझे सड़क पर बेसहारा छोड़ दिया। अगर आज मेरे पति और बेटे जिंदा होते तो शायद मुझे यहां नहीं रहना पड़ता। जिस मां के सामने उसके दोनों बेटों और पति की मौत हो जाए, उससे ज्यादा उसके साथ क्या ही बुरा होगा। मेरी बेटी को तो यह भी नहीं पता कि मैं जीवित हूं या नहीं। पर अब मैं यहां खुश हूं। - संतोष
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