कम उम्र में बच्चों को लग रहा चश्मा, रोजाना दो से तीन बच्चे पहुंच रहे अस्पताल
संवाद न्यूज एजेंसी
फरीदाबाद। बच्चों में कम उम्र में ही चश्मा लगने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जो अभिभावकों और विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। नेत्र रोग विशेषज्ञों के अनुसार मोबाइल, लैपटॉप और टीवी जैसी डिजिटल स्क्रीन का अधिक उपयोग, घर से बाहर की गतिविधियों में कमी और पढ़ाई का बढ़ता दबाव इसके प्रमुख कारण हैं। इससे बच्चों में मायोपिया (निकट दृष्टि दोष) और आंखों पर स्ट्रेन की समस्या बढ़ रही है।
जिला नागरिक अस्पताल में भी ऐसे मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। अस्पताल के नेत्र विभाग में प्रतिदिन दो से तीन बच्चे आंखों की रोशनी कम होने या धुंधला दिखने की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं। जांच के बाद कई बच्चों को चश्मा लगाने की सलाह दी जा रही है।
डॉक्टरों का कहना है कि लंबे समय तक मोबाइल या अन्य डिजिटल स्क्रीन देखने से आंखों पर दबाव पड़ता है। वहीं बच्चों का बाहर खेलना कम होने से भी आंखों के विकास पर असर पड़ता है।
जिला नागरिक अस्पताल की नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. संगीता गोयल ने बताया कि आजकल बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ काफी समय मोबाइल और अन्य डिजिटल स्क्रीन पर बिताते हैं, जिससे आंखों पर दबाव बढ़ता है और कम उम्र में ही मायोपिया की समस्या सामने आने लगती है। उन्होंने बताया कि अस्पताल में प्रतिदिन दो से तीन बच्चे ऐसे आ रहे हैं जिन्हें चश्मे की जरूरत पड़ रही है। अभिभावकों को चाहिए कि बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित करें और उन्हें रोज कम से कम एक से दो घंटे घर से निकलकर गतिविधि में शामिल होने के लिए प्रेरित करें।
उन्होंने बताया कि बच्चों को पढ़ाई करते समय पर्याप्त रोशनी, सही दूरी और बीच-बीच में आंखों को आराम देना भी जरूरी है, ताकि आंखों पर पड़ने वाला दबाव कम किया जा सके। इसके साथ ही बच्चों के पोषण पर भी खास ध्यान देना चाहिए।