केंद्र से मंजूरी मिलती है तो पर्यटन विभाग को इसके बदले दोगुने क्षेत्रफल की वन भूमि हस्तांतरित करनी होगी
संवाद न्यूज एजेंसी
फरीदाबाद। जिले के सूरजकुंड पर्यटन परिसर से जुड़ी 37 हेक्टेयर वन भूमि को नियमित कराने के लिए हरियाणा सरकार ने केंद्र सरकार से एक्स-पोस्ट-फैक्टो (बाद में मंजूरी) वन स्वीकृति मांगी है। यह भूमि पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम (पीएलपीए) की धारा 4 और 5 के तहत अधिसूचित वन क्षेत्र में आती है। प्रस्ताव पर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (एफएसी) की बैठक में विचार किया गया। अब समिति की सिफारिश के आधार पर केंद्र सरकार अंतिम निर्णय लेगी।
सूरजकुंड पर्यटन परिसर अरावली की संवेदनशील पहाड़ियों के बीच लक्कड़पुर गांव में स्थित है। वर्ष 1980 में बने इस परिसर का समय-समय पर विस्तार किया गया। वर्तमान में इसका कुल क्षेत्रफल करीब 55 हेक्टेयर है, जिसमें लगभग 37 हेक्टेयर हिस्सा अधिसूचित वन भूमि पर है। यदि केंद्र से मंजूरी मिलती है तो पर्यटन विभाग को इसके बदले दोगुने क्षेत्रफल की वन भूमि हस्तांतरित करनी होगी।
1980 में बना परिसर, विस्तार के साथ बढ़ा वन भूमि का उपयोग
सूरजकुंड पर्यटन परिसर का निर्माण वर्ष 1980 में हुआ था। इसके बाद अलग-अलग चरणों में इसका विस्तार किया गया। अब परिसर का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा ऐसी भूमि पर है जिसे वन क्षेत्र माना जाता है। हर साल यहां अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड शिल्प मेले का आयोजन होता है और लाखों पर्यटक पहुंचते हैं।
मुआवजे में दोगुनी वन भूमि देनी होगी
वन संरक्षण अधिनियम के तहत यदि वन भूमि का अन्य उपयोग किया जाता है तो उसके बदले दोगुने क्षेत्रफल की भूमि वन विभाग को दी जाती है। जिला प्रशासन ने फरीदाबाद के वैली पार्क और गुरुग्राम के कुछ क्षेत्रों को इसके लिए संभावित स्थान के रूप में चिन्हित किया है।
वन संरक्षण कानून के अनुसार वन भूमि का गैर-वन कार्यों में उपयोग करने से पहले केंद्र सरकार की अनुमति लेना अनिवार्य है। इस मामले में अनुमति बाद में मांगी गई है। इसलिए यह प्रस्ताव सीधे केंद्रीय स्तर पर जांच के लिए भेजा गया है। चूंकि मामला पूर्व प्रभाव से मंजूरी का है, इसलिए एफएसी की समीक्षा अहम मानी जा रही है।
विशेषज्ञ बोले- अरावली में नियमों का सख्ती से पालन जरूरी
राज्य के पूर्व वन संरक्षक आरपी बलवान का कहना है कि पर्यटन परियोजनाओं को वन मंजूरी मिल सकती है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि पूर्व स्वीकृति क्यों नहीं ली गई। उनका कहना है कि अरावली जैसे पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में ऐसे मामलों की गहन जांच होनी चाहिए और बाद में मंजूरी को सामान्य प्रक्रिया नहीं बनाया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जुड़ा मामला
जुलाई 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि पीएलपीए की धारा-4 के तहत अधिसूचित सभी भूमि को वन क्षेत्र माना जाएगा और उन पर वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के प्रावधान लागू होंगे। इसी आदेश के बाद ऐसे मामलों में केंद्र सरकार की मंजूरी अनिवार्य हो गई है। अब सूरजकुंड परियोजना पर केंद्र का फैसला भविष्य में अरावली क्षेत्र की अन्य परियोजनाओं के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
फिलहाल प्रस्ताव केंद्र सरकार को मंजूरी के लिए भेजा गया है। स्वीकृति मिलने के बाद भूमि हस्तांतरण और अन्य आवश्यक प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाया जाएगा।-झलकार उयाके, जिला वन अधिकारी