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Faridabad News: शहीदों पर गर्व पर परिजनों की कई मांगें आज भी अधूरी

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स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों से लेकर आतंकवाद और युद्ध में बलिदान देने वाले जवानों की यादें आज भी गांवों में जीवित हैं
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हेमलता

बल्लभगढ़। देश की आजादी से लेकर सीमाओं की रक्षा तक जिले के वीरों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया है। स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों से लेकर आतंकवाद और युद्ध में बलिदान देने वाले जवानों की यादें आज भी गांवों में जीवित हैं। कई गांवों में सरकारी स्कूलों, स्टेडियम और संस्थानों के नाम शहीदों के नाम पर रखे गए हैं, जबकि कुछ जगह उनकी प्रतिमाएं स्थापित कर हर वर्ष श्रद्धांजलि दी जाती है। हालांकि, कई शहीद परिवार आज भी स्मारक, प्रतिमा या सड़क का नामकरण जैसी मांगों को लेकर सरकारी आश्वासनों का इंतजार कर रहे हैं।


शहीद को याद कर नम हो जाती हैं आंखें



जम्मू-कश्मीर के राजौरी के दरहाल क्षेत्र में आतंकवादियों से मुकाबला करते हुए बलिदान होने वाले गांव शाहजहांपुर निवासी मनोज भाटी को आज भी उनका परिवार और ग्रामीण याद करते हैं। शहीद मनोज के पिता बाबूलाल और मां सुनीता की आंखें बेटे को याद कर आज भी नम हो जाती हैं। पिता कहते हैं कि उन्हें बेटे के बलिदान पर गर्व है। मनोज ने आतंकवादियों से मुकाबला करते हुए कैंप में सो रहे करीब 50 जवानों की जान बचाई थी। इसी दौरान सिर में गोली लगने से उन्होंने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। 16 फरवरी 1996 को किसान परिवार में जन्मे मनोज भाटी ने शहीद स्मारक राजकीय कॉलेज तिगांव से स्नातक की पढ़ाई की थी। वर्ष 2017 में वह गुरुग्राम से राज राइफल्स की 11वीं रेजीमेंट में भर्ती हुए थे। 14 नवंबर 2021 को गांव सीकरी निवासी कोमल के साथ उनका विवाह हुआ था। मंगलवार को उनकी पुण्यतिथि पर प्रतिमा पर फौजियों और ग्रामीणों ने पुष्पमाला अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
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1965 के युद्ध में शहीद हुए विक्रम सिंह की याद में स्मारक का इंतजार



गांव सुनपेड़ निवासी विक्रम सिंह वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में शहीद हुए थे। परिवार का कहना है कि उनकी शहादत को सम्मान देने के लिए गांव में शहीद स्मारक बनाने के कई बार आश्वासन मिले, लेकिन आज तक यह मांग पूरी नहीं हुई। परिवार के सदस्य बताते हैं कि उन्होंने स्मारक और प्रतिमा के लिए नेताओं और अधिकारियों के सामने कई बार गुहार लगाई, लेकिन हर बार आश्वासन ही मिला।परिजनों के मुताबिक शहीद विक्रम सिंह के बलिदान के बाद सरकार की ओर से परिवार को एक भैंस और कुछ आर्थिक सहायता दी गई थी। परिवार का कहना है कि इतने वर्षों बाद भी गांव में शहीद की याद में स्मारक नहीं बन पाना पीड़ादायक है।



पति की शहादत पर गर्व करती हैं गीता देवी

गांव अटाली के बलिदानी संदीप सिंह की वीरता आज भी ग्रामीणों के लिए प्रेरणा है। वर्ष 2019 में पुलवामा में आतंकवादियों के खिलाफ सर्च अभियान के दौरान 33 वर्ष की आयु में गोली लगने से संदीप सिंह शहीद हो गए थे। उनकी वीरांगना गीता देवी पति को याद करते हुए भावुक हो जाती हैं, लेकिन उन्हें इस बात का गर्व है कि उनके पति ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपना फर्ज निभाया। गीता देवी अपने दोनों बेटों रक्षित और रसित की परवरिश कर रही हैं और उन्हें भी सेना में जाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। शहीद संदीप सिंह को मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था। उनके नाम पर गांव के स्टेडियम का नाम रखा गया है। परिवार के अनुसार सरकार की घोषणा के तहत नौकरी भी मिल चुकी है।
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वीरेंद्र अत्री के नाम पर स्कूल और स्मारक, सड़क का इंतजार

कारगिल युद्ध में शहादत देने वाले गांव मोहना निवासी वीरेंद्र अत्री युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं। वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ते हुए शहीद हुए जवानों की याद में हर वर्ष 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है। गांव मोहना में शहीद वीरेंद्र कुमार के नाम पर राजकीय शहीद वीरेंद्र कुमार वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय है। स्कूल परिसर में उनकी प्रतिमा और स्मारक भी स्थापित है। शहीद के बड़े भाई डॉ. हरप्रसाद अत्री ने बताया कि परिवार को करीब 22 वर्ष बाद गांव मोहना में 200 गज का प्लॉट मिला है। हालांकि, मोहना से अटाली जाने वाली सड़क का नाम अभी तक शहीद वीरेंद्र अत्री के नाम पर नहीं रखा गया है। परिवार की मांग है कि सड़क का नामकरण शहीद के नाम पर जल्द किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी उनके बलिदान को याद रख सकें।
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