फरीदाबाद। नगर निगम के पैनल अधिवक्ताओं के वेतन के 32.57 लाख रुपये की धोखाधड़ी के आरोपी जिला न्यायवादी शाखा में तैनात रहे निरीक्षक सुंदर सिंह को आर्थिक अपराध जांच शाखा (एनआईटी जोन) ने गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने उसे 25 दिसंबर को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहां से उसे दो दिन की रिमांड पर लिया गया था। शुक्रवार को रिमांड समाप्त होने पर पुलिस ने उसे दोबारा से अदालत में पेश कर एक दिन के रिमांड पर लिया गया है। रिमांड के दौरान पुलिस उसे नगर निगम मुख्यालय लेकर गई थी।
नगर निगम ने अदालतों में लंबित मामलों की पैरवी के लिए वकीलों का पैनल बना रखा है। नगर निगम के पैनल पर अधिवक्ता नरेश कुमार भाटी, नरेश तंवर, नरेश कुमार, नरेश सिंगला और नरेश गर्ग मौजूद हैं। नगर निगम की जिला न्यायवादी (डीए) शाखा में बतौर निरीक्षक कार्यरत सुंदर सिंह की जिम्मेदारी पैनल अधिवक्ताओं के वेतन का भुगतान करवाना भी था। सुंदर सिंह ही लेखा शाखा से अधिवक्ताओं के वेतन आदि की फाइल पास कराता था। आरोप है कि इस दौरान सुंदर सिंह ने सेक्टर-16 स्थित एक निजी बैंक में नरेश नाम से एक फर्जी खाता खुलवाया और निगम के पैनल अधिवक्ताओं की फीस का डीडी बनवाकर उस खाते में जमा करवाता था और बाद में खाते से रुपये निकाल लेता था। आरोप है कि सुंदर सिंह ने वर्ष 2013 से 2018 तक 24 बार में डीडी बनवाकर 32.57 लाख रुपये का गबन किया।
मामला पकड़ में आने के बाद तत्कालीन निगमायुक्त मोहम्मद शाइन ने सुंदर सिंह के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज करवाया था। इसकी जांच आर्थिक अपराध जांच शाखा को सौंपी गई थी। विगत 25 दिसंबर को आर्थिक अपराध जांच शाखा ने सुंदर को गिरफ्तार कर अदालत में पेश कर दो दिन के रिमांड पर लिया था। जांच अधिकारी एएसआई करण सिंह ने बताया कि रिमांड के दौरान पुलिस टीम उसे नगर निगम मुख्यालय में लेकर गई और वहां लेखा शाखा व डीए ब्रांच में अधिकारियों के सामने बैठाकर पूछताछ की। रिमांड समाप्त होने पर शुक्रवार को उसे दोबारा अदालत में पेश कर एक दिन का रिमांड लिया गया है।
निगम मुख्यालय से गायब हो गई फाइल
सुंदर सिंह के मामले में विभागीय स्तर पर भी जांच चल रही थी। अतिरिक्त आयुक्त स्तर के अधिकारी ने इसमें जांच कर अपनी रिपोर्ट दी थी। जांच रिपोर्ट की पूरी फाइल नगर निगम की प्रस्थापना शाखा (ईओ ब्रांच) में रखी थी, मगर बहुत ही नाटकीय तरीके से सितंबर माह में वह फाइल प्रस्थापना शाखा की अलमारी से गायब हो गई। हैरत की बात है कि चार माह बाद भी इस बारे में न तो निगमायुक्त को बताया गया और न ही एफआईआर दर्ज करवाई गई। अखबारों में खबर छपने के बाद निगमायुक्त सोनल गोयल ने इसमें एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए हैं।