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दिल्ली के 4000 बच्चों को छोड़ना पड़ेगा स्कूल!

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हजारों बच्चे जो दिल्ली के सरकारी स्कूलों में नवीं कक्षा में पढ़ने का ख्वाब देख रहे हैं उसके सच होने में बहुत बड़ी परेशानी सामने दिख रही है। ऐसा भी लगता है कि शायद इन सभी को पढ़ाई भी छोड़नी पड़ सकती है क्योंकि शिक्षा विभाग ने कक्षा 9 में एडमिशन के लिए जो एंट्रेंस टेस्ट लिया था उसमें 48 प्रतिशत बच्चे फेल हो गए हैं।
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अधिकर बच्चों और कम सीट को देखते हुए इस साल शिक्षा विभाग ने नॉन-प्लान छात्रों के लिए तीन एंट्रेंस टेस्ट लिए। इन टेस्ट के बाद शिक्षा विभाग ने जो आंकड़ें जारी किए वो हैरान करने वाले हैं क्योंकि कुल 9,189 बच्चों में से 4,400 बच्चे फेल हो गए।

सभी सरकारी स्कूलों के बच्चे जिन्हें कक्षा 8 में प्रमोट कर दिया गया था वो सभी एडमिशन प्लान में शामिल हैं और उन सबको एडमिशन दे दिया गया है। हालांकि डायरेक्टरेट ऑफ एजुकेशन ने नॉन-प्लान छात्रों के एडमिशन में सीट की कमी के कारण आ रही दिक्कत को पहले ही जता दिया है।
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संसाधनों की कमी भी है एक बड़ी वजह

डीओई के लिखे एक पत्र के अनुसार पहला टेस्ट जो 2 मई को लिया गया था उसमें 4,312 बच्चों में से केवल 2,224 बच्चे पास हुए। 23 जुलाई को हुआ दूसरा टेस्ट बाकी बच्चों का लिया गया था। जिसमें कुल 3,517 बच्चों से 1,527 बच्चे पास हुए।

जब दो बार के बाद भी बच्चे एडमिशन के लिए बचे रह गए तो शिक्षा विभाग ने तीसरी बार एंट्रेस के लिए 19 अगस्त की तारीख तय की गई जिसममें कुल 1,360 बच्चों में से 1,045 बच्चे ही पास हो पाए।

लोनी में रहने वाली रहने वाली एक लड़की का एडमिशन स्कूल में हो गया हालांकि उसने एंट्रेंस टेस्ट पास नहीं कर पाई थी। क्लास 8 से पास होने के बाद इसे कई सरकारी स्कूलों में एडमिशन देने से इसलिए मना कर दिया गया था क्योंकि इसने एंट्रेंस टेस्ट नहीं दिया था। आखिरकार उसे विकलांग कोटे के आधार पर और हाई कोर्ट के आदेश पर एडमिशन मिल गया।

लेकिन बहुत से बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने ये एंट्रेंस पास नहीं किया और अब उनके पास स्कूल छोड़ने के अलावा और कोई चारा नहीं है। डीओई के अनुसार पहले से ही हर क्लास में लगभग 2 लाख बच्चें हैं और कक्षा 9 में अन्य 2 लाख 72 हजार छात्रों के दाखिला लेने की वजह से स्कूल के संसाधनों और जगह पर अतिरिक्त भार बढ़ा है।
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'बच्चों से ज्यादा है राज्य सरकार की गलती'

डीओई की निदेशक, पद्मिनी सिंगला ने कहा कि शिक्षा के अधिकार के तहत कक्षा आठ तक स्कूल बच्चों की पढ़ाई में कोई रोक नहीं लगा सकते। इस तरह वो बच्चों को फेल नहीं कर सकते जिसके कारण अयोग्य बच्चे भी कक्षा 9 में पहुंच जाते हैं। इसलिए शिक्षा विभाग ने 9वीं में एडमिशन के लिए टेस्ट की सोची है ताकि बच्चे पढ़ने के लिए प्रेरित हों और उनकी योग्यता भी जांची जा सके।

सिंगला ने आगे कहा कि हम अपने स्कूल के बच्चों के दाखिले के लिए भी मना नहीं कर सकते। सरकार के पास सीमित संसाधन हैं तो इसके बाद यही एक उपाय बचता है। तीसरे टेस्ट के बाद हमारे पास कुल 300 ऐसे बच्चें हैं जिन्हें बैठाने आदि की व्य‌वस्था करना हमारे लिए मुश्किल हो रहा है।

सिंगला दावा करती हैं कि ‌प्राइवेट स्कूल उन बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने की कोशिश कर रहे हैं जो अच्छा रिजल्ट नहीं ला रहे, खासतौर से 8वीं कक्षा के बाद। ऐसे बच्चों में से अधिकतर वो बच्चे हैं जो गरीब और बाहर से आए हुए परिवारों से हैं।

शिक्षा पर काम कर रहे एक वकील का कहना है कि राज्य सरकार के पास कक्षा 8 तक के बच्चों के लिए ना ही पर्याप्त संसाधन है और ना ही शिक्षा में वो गुणवत्ता, जिसका परिणाम ये होता है कि बच्चे 9वीं कक्षा में फेल हो जाते हैं। इसमें बच्चों की गलती नहीं है बल्कि राज्य की गलती है।

साभारः इंड‌ियन एक्सप्रेस
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