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दिल्ली अग्निकांडः हर माह लाखों रुपये से ज्यादा में बंद हो जाती है जिम्मेदारों की आंखें

Tue, 10 Dec 2019 07:01 AM IST
संजीव कुमार झा नवनीत सरन, अमर उजाला
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दिल्ली अग्निकांड - फोटो : अमर उजाला
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रिहायशी इलाकों के घरों में फैक्टरी चलानी हो तो दो से चार हजार रुपये प्रति माह पुलिस का बंधा हुआ है। प्रदूषण विभाग के अधिकारियों को आपकी अवैध फैक्टरी से पॉल्यूशन न दिखें उसका भी दो से तीन हजार रुपये महीना देना होता है।

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घरेेलू बिजली के कनेक्शन के नाम पर कामर्शियल बिजली का उपयोग करना हो तो उसका भी पांच सौ से तीन हजार रुपये प्रति माह देना होता है। इसके अलावा जल बोर्ड से लेकर नगर निगम और अन्य जिम्मेदार महकमों को भी इतने ही रुपये देने होते हैं।

तब जाकर दिल्ली की रिहायशी कॉलोनियों में अवैध तरीके से मौत की फैक्ट्रियां चलती हैं। अमर उजाला ने अनाज मंडी रिहायशी इलाके में चल रही अवैध फैक्टरी में आग लगने से हुई मौतों के बाद जब यह जानने की कोशिश की कि आखिर अवैध काम हो कैसे जाता है तो पता चला कि इसके लिए अच्छी खासी कीमतें चुकानी पड़ती हैं। उसके बाद आपको ऐसी मौत की फैक्ट्रियों को चलाने का लाइसेंस मिल जाता है।
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अमर उजाला ने दिल्ली के गांधी नगर, मौजपुर, भजनपुरा, नंदनगरी, रिठाला, शास्त्री नगर, तेेहखंड, जनता कॉलोनी और शाहदरा समेत वेलकम इलाके के रिहायशी इलाकों में चलने वाली अवैध फैक्टरी मालिकों से बात की। तकरीबन तीन दर्जन से ज्यादा लोगों से बातचीत के बाद एक बात तो स्पष्ट हो गई कि बगैर रिश्वत दिए उनका धंधा चल ही नहीं सकता।

गांधी नगर के एक व्यापारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उसने अपने घर में जब कपड़ों का काम शुरू किया तो बिजली कनेक्शन के नाम पर ही इंजीनियर ने बीस हजार रुपये ले लिए। उसके बाद घरेलू कनेक्शन के नाम पर कामर्शियल बिजली का इस्तेमाल करने की अनुमति मिली।

हालांकि उक्त फैक्टरी मालिक ने बताया कि जब से दिल्ली में बिजली फ्री हुई है तब से हर महीने वसूली के रुपये कम हो गए हैं। भजनपुरा में एक घर में ग्लब्स बनाने की फैक्टरी के मालिक ने बताया कि जब उसने इसके लिए रजिस्ट्रेशन करवाने की सोची तो संबंधित महकमों ने उसे खारिज कर दिया।

हां, यह बात दीगर है कि उसी घर में फैक्टरी चलाने का दूसरा रास्ता जरूर बता दिया। इसके लिए हर महीने एक फीस तय कर दी गई। जुगाड़ से काम करवाने के लिए तकरीबन दस हजार रुपये प्रति माह पर सौदा तय हो गया। अब वहां पर धड़ल्ले से काम चल रहा है।

 इतनी रकम देकर चलता है काम

  • प्रदूषण विभाग -2500 से 3000 रुपये प्रति माह
  • एमसीडी - 2000 से 2500 रुपया महीना।
  • पुलिस - 2000 रुपया।
  • श्रम विभाग -1500 से 2000 हजार रुपया।
  • बिजली विभाग -500 से 3000 हजार रुपया।
  • जल बोर्ड- 500 से 1000 हजार रुपया।
  • कई अवैध धंधा करने के लिए वार्षिक भी घूस देना पड़ता है। जो दो लाख रुपये से कम नहीं होता।
  • अवैध निर्माण कार्य के लिए लाखों में घूस देने पड़ते हैं। प्रति लिंटर एमसीडी व अन्य विभागों को एरिया के हिसाब से 10-20 लाख तक देना पड़ता है।
(यह रकम अवैध कारोबार के साइज से कम और ज्यादा भी हो जाती है)

फैक्ट फाइल:

  • एक लाख के करीब छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां चलती है दिल्ली के विभिन्न इलाकों में।
  • करीब सौ करोड़ रुपये हर महीने मौत का फैक्टरी चलाने वाले देते हैं विभिन्न महकमों को नजराना
  • छोटे कारोबारियों से 10-15 हजार रुपये तो बड़ी फैक्टरी चलाने वाले एक लाख तक घूस देते है।

हमें सुविधा मिले तो घूस क्यों देनी पड़ेगी

कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि व्यापारियों का अनेक विभागों से सरोकार होता है। घूस के बगैर कुछ नहीं होता।

घूस नहीं देने पर व्यापारियों को प्रताड़ित होना पड़ता है। डीडीए व एमसीडी ने फैक्टरी चलाने की जगह तक नहीं बनाई है।

सरकार तो रोजगार देती नहीं है। फैक्टरी चलाने वाले ही लोगों को रोजगार देते है। फैक्टरी बंद हुई तो लाखों बेरोजगार हो जाएंगे।

व्यापारियों को इमानदारी से काम नहीं करने दिया जाता

फेडरेशन ऑफ ट्रेड एसोसिएशन ऑफ दिल्ली के अध्यक्ष अजय अरोड़ा ने कहा कि  व्यापारियों को ईमानदारी से काम नहीं करने दिया जाता। अवैध रूप से फैक्ट्रियां भी तभी चलती हैं जब जेब गर्म किया जाता है। संबंधित विभाग के भ्रष्टाचार का सामना व्यापारियों का करना पड़ता है।

एमएसडी के लाइसेंसिंग इंस्पेक्टर का रेट एक लाख तक

उत्तरी दिल्ली एमसीडी के  नेता विपक्ष मुकेश गोयल ने कहा कि  अवैध फैक्ट्रियां चलाने के लिए लाइसेंसिंग इंस्पेक्टर 50 हजार से 1 लाख रुपये तक की मोटी रकम वसूलते है। कारोबारियों को धमकाने के लिए सीलिंग की नोटिस लगाते है।

पैसा मिलने के बाद फैक्ट्रियों को अवैध रूप से चलाने के लिए छोड़ देते है। एमसीडी में अधिकारियों ने भ्रष्टाचार फैला रखा है। इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

लाइसेंस सरकार देती नहीं है इसलिए भ्रष्टाचार बढ़ता है

लाइसेंस सरकार देती नहीं है इसलिए भ्रष्टाचार बढ़ता है अवैध रूप से फैक्टरी चलवाने के फायर, प्रदूषण, श्रम और बिजली विभाग शामिल हैं। बिना इन विभागों के एमसीडी फैक्टरी चलाने के लिए लाइसेंस नहीं देती है। घूस देकर एनओसी लिए जाते है। इस एनओसी के बाद ही एमसीडी फैक्टरी चलाने का लाइसेंस देती है।
जयप्रकाश, स्थायी समिति अध्यक्ष, उत्तरी दिल्ली एमसीडी


एमसीडी भ्रष्टाचार में लिप्त

एमसीडी भ्रष्टाचार में लिप्त है। किसी बिल्डिंग के निर्माण में उसको सील करने का जिम्मा एमसीडी का है। दिल्ली सरकार के फायर विभाग ने स्पष्ट किया है कि किसी तरह की एनओसी नहीं दी गई है। अगर दो सप्ताह पहले एमसीडी अधिकारी मौके पर गए थे तो फैक्टरी सील क्यों नहीं की गई। कही एमसीडी अधिकारियों ने मोटा पैसा तो नहीं ले लिया।
संजय सिंह, आम आदमी पार्टी के सांसद
 

जवाब दें सरकार

बिजली बिल लाखों का आने के बावजूद बिजली मीटर घरेलू क्यों था। घर में फैक्टरी चल रही थी तो श्रम विभाग चुप क्यों बैठा था। क्या श्रम व उद्योग विभाग घूस लेकर चुप हो गया था। फायर विभाग मौन क्यों रहा। विजिलेंस विभाग पर भी सवाल है कि क्या वह सो रहा था। अगर सभी विभाग अपना-अपना काम करते तो बहुमूल्य जीवन को बचाया जा सकता था।
मनोज तिवारी, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष
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बिजली कंपनियां जिम्मेदार

दर्दनाक हादसे के लिए सरकार के ऊर्जा मंत्री व बिजली कंपनियां दोषी हैं। ऊर्जा मंत्री और बिजली कंपनियों की सांठगांठ से इन क्षेत्रों में इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए 825 करोड़ रुपये की धनराशि बिजली कंपनियों ने खर्च करने का दावा किया है।

जो पूरी तरह गलत है। कंपनी का यह दावा कि 650 किलोमीटर केबल सिस्टम को मजबूत किया है, सत्य से परे है। 650 किलोमीटर केबल अगर भूमिगत कर दी जाती तो यह हादसा नही होता।
सुभाष चोपड़ा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष

 जिम्मेदारों की दलीलें

बीएसईएस बिजली कंपनी के प्रवक्ता ने कहा कि कंपनियां बिजली देने को बाध्य है। विभाग की टीम छापामारी करती है और बिजली चोरी करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाती है। अदालत उन पर जुर्माना भी ठोकता है। फैक्टरी चलाने के लिए कामर्शियल मीटर ही लगाए जाते है। जिस घर में हादसा हुआ, वहां भी कामर्शियल मीटर लगे है। बिजली की टीम औचक निरीक्षण करती है।
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