हर साल निमोनिया से सैकड़ों मौतें हो रही हैं। ठंड में अक्सर निमोनिया के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। चूंकि, इस बार कोरोना संक्रमण का खतरा भी ज्यादा है। ऐसे में निमोनिया की आशंका और भी बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि हवा में मौजूदा कार्बन के साथ निमोनिया जहर बन सकता है।
बुधवार को विश्व निमोनिया दिवस की पूर्व संध्या पर दिल्ली के विशेषज्ञों ने लोगों से सतर्कता बरतने की अपील की। डॉक्टरों का कहना है कि हवा में कार्बन की मात्रा बढ़ने से निमोनिया के साथ मिलकर ये नवजात शिशुओं की मौत की बड़ी वजह बन सकता है। दिल्ली में सबसे ज्यादा शिशुओं की मौतें निमोनिया और डायरिया जैसी बीमारियों से होती हैं। 2017 में 200 शिशुओं की इसी कारण मौत हुई।
यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2018-2019 में निमोनिया के चलते भारत में 1.27 बच्चों की मौत हुई थी, जिनकी आयु दो वर्ष से भी कम थी। सफदरजंग अस्पताल के डॉ. युगल किशोर बताते हैं कि निमोनिया भले ही उपचार योग्य बीमारी है, लेकिन इसके बावजूद बच्चों और बड़ों की मौत के प्रमुख कारणों में शामिल है।
डॉक्टरों का कहना है कि जब कोई व्यक्ति खांसता व छीकता है तो इसका वायरस व बैक्टीरिया सांस द्वारा फेफड़ों तक पहुंचकर व्यक्ति को संक्रमित कर देता है। निमोनिया का अटैक बच्चों पर ज्यादा होता है। इसके अलावा कम्युनिटी एक्वॉयर्ड निमोनिया (सीएपी) के केस सबसे ज्यादा मिल रहे हैं। ये अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी फैलता है।
सीएपी का टीका और पर्याप्त दवाएं होने के बाद भी मरने वालों की संख्या ज्यादा है। ये बीमारी बुजुर्गों को भी नहीं छोड़ती है। प्रदूषण के दौरान यह और भी ज्यादा घातक हो जाता है। क्योंकि, सांस के जरिए लोगों के शरीर में पहुंचने वाले कार्बन की वजह से संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है। इसलिए फिलहाल लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए।
डॉक्टरों के अनुसार, सांस तेज लेना, कफ की आवाज आना आदि भी निमोनिया का संकेत हो सकते हैं। निमोनिया के आम लक्षणों में खांसी, सीने में दर्द, बुखार और सांस लेने में मुश्किल आदि होते हैं। उल्टी होना, पेट या सीने के निचले हिस्से में दर्द होना, कंपकंपी, शरीर में दर्द, मांसपेशियों में दर्द भी निमोनिया के लक्षण हैं।