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6 साल के बच्चे ने पुजारी को कुरान पढ़ाने की कसम खाई

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विश्व में धार्मिक सौहार्द की एक से एक मिसालें मौजूद हैं। इस कड़ी में गुड़गांव के पटौदी के छह साल के रेहान खान का भी नाम शामिल हो गया है। उसने एक मंदिर के महामंडलेश्वर को कुरआन पढ़ना सिखाने की कसम खाई है।
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यही नहीं इस वक्त वह उन्हें उर्दू और अरबी भाषा की वर्णमाला सिखाने में व्यस्त है। इसको लेकर दोनों में इतनी गहरी छनने लगी है कि महाराज जी ने ईद पर उसके घर आने का न्योता स्वीकार लिया है।

दोनों के रिश्तों, नियत और पढ़ने पढ़ाने के तौर तरीकों पर भले अनेक सवाल उठाए जा सकते हैं, पर इस से बेपरवाह वे अपने कामों में व्यस्त हैं। महामंडलेश्वर ज्योति गिरी गुड़गांव के नेशनल आईवे आठ से लगते गांव भौड़ाकलां के महाकाल मंदिर में रहते हैं।
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फिलहाल ऐसी हो रही हैं परेशानियां

वह कहते हैं कि शिवरात्री के कारण उनकी व्यस्तताओं के चलते पढ़ाई पर पूरा ध्यान नहीं दे पा रहे थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। वैसे, इनके पढ़ने-पढ़ाने का सिलसिला बहुत लंबा नहीं है। तकरीबन पच्चीस दिन पहले इसकी शुरुआत हुई है। इसके बावजूद ज्योति गिरी उर्दू कायदा खत्म करने पर आ गए हैं।

वह अमर उजाला से अनुभव बांटते हुए कहते हैं, उच्चारण एवं हिंदी-अंग्रेजी से भिन्न इसके लिखने-पढ़ने के तरीके से उन्हें थोड़ी परेशानी हो रही है।

दोनों की इस पहल पर हिंदू और मुस्लिम समुदाय की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। संस्कार भारती के राजवी मित्तल कहते हैं कि किसी भी धर्म के बारे में सही समझ के लिए उसकी धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन जरूरी है। इसी तरह की प्रतिक्रिया हरियाणा अंजुमन वेल्फेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष असलम खान की है।

मुसलमानों को पढ़ाया जा सकते हैं वेद

इससे प्रेरणादायक बताते हुए मुसलमानों को वेद पढ़ने की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि डॉक्टर जाकिर नायक, डॉक्टर वहीदुद्दीन खान जैसे अनेक मुस्लिम स्कॉलर कई मजहबों के ज्ञाता हैं। महामंडलेश्वर भी ऐसा करना चाहते हैं तो इसका स्वागत होना चाहिए। महजबों के बीच की भ्रांतियां दूर होंगी।

इस बारे में गुड़गांव जामा मस्जिद के इमाम जान मोहम्मद की प्रतिक्रिया है- बेहतर होता कि महामंडलेश्वर उर्दू और अरबी किसी आलिम से सीखते। ऐसा न कर ज्योति गिरी ने किसी बच्चे से उर्दू और अरबी सीखना क्यों जरूरी समझा? इस सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि वह पीएचडी हैं।

इस्लाम के बारे में जानकारी हासिल करना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने जब मौलानाओं से मंदिर में आकर कुरआन पढ़ाने की बात कही, तो उन्होंने मना कर दिया। इसी बीच क्रिकेटर नवाब मंसूर अली खान के शहर पटौदी में स्टूडियो चलाने वाले रफीक खान और दो बहनों में सबसे छोटा रेहान खान उनके संपर्क में आए।
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पहले आंख की बीमारी से ग्रसित था ये बच्चा

डीएवी स्कूल की पहली जमात का विद्यार्थी यह बालक आंख की बीमारियों को लेकर परेशान रहता था। इसकी दाईं आंख में ट्यूमर जैसा रोग पनपने लगा था। कई डॉक्टरों को दिखाने के बावजूद जब ठीक नहीं हुआ तो किसी ने रफीक को बताया कि ज्योति गिरी वैद्य का भी काम करते हैं। उन्हें बच्चे को दिखाए।

रफीक ने अमर उजाला को बताया कि वह जब बच्चे को लेकर बाबा के पास गया तो उन्होंने उसे दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल भेज दिया। जहां ऑपरेशन के बाद बच्चे की आंख ठीक हो गई। इसके बाद जब वह महाराज का धन्यवाद करने मंदिर गया तो उन्होंने उर्दू-अरबी सीखने की इच्छा जताई।

इसपर बच्चे ने उनसे वादा किया कि वह उन्हें पढ़ाएगा। इसके बाद घर आते ही वह मां से उर्दू और अरबी पढ़ाने की जिद करने लगा। इसपर घर वालों ने एक मौलवी हकीमुद्दीन को इसकी जिम्मेदारी दे दी। मौलवी साहब से पढ़ने के बाद वह महामंडालेश्वर को पढ़ाने मंदिर जाता है। इन दिनों वह ईद पर घर आने वाले महामंडलेश्वर की दावत की तैयारियों में व्यस्त है।
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