सी-सैट पर सरकार के फैसले के खिलाफ कई नौकरशाह और समाज विज्ञानी सामने आए हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए इन सब ने कहा कि एप्टीट्यूड टेस्ट और फंक्शनल प्रोफेशियंसी इन इंग्लिश ये दोनों ही सी-सैट के भाग हैं और ये दोनों ही चीजें सिविल सेवा के लिए योग्य उम्मीदवार के चयन में सहायक हैं।
पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी और देश के प्रतिष्ठित नौकरशाहों में से एक नरेश चंद्रा ने कहा, 'क्लास वन अफसर से ये उम्मीद की जाती है कि वो अंग्रेजी भाषा जानें। इंग्लिश कांप्रिहेंसन में पूछे जाने सवाल इतने सामान्य होते हैं कि उसे सेकेंड क्लास या थर्ड क्लास में दसवीं पास करने वाला बच्चा भी सॉल्व कर सकता है।
जो भी उम्मीदवार इस परीक्षा की तैयारी करता है उसके लिए उस भाषा को जानना आवश्यक है जो कि पूर्वोत्तर के राज्यों से संवाद करने की मुख्य भाषा है। इसलिए किसी भी क्षेत्रीय भाषा की तुलना में अंग्रेजी का ज्ञान ज्यादा महत्वपूर्ण है।'
'अंग्रेजी की फ्री कोचिंग दे सरकार'
अमेरिका में भारत के पूर्व राजनयिक रहे चंद्रा ने कहा कि सरकार विरोध करने वाले छात्रों को ये समझाने में नाकाम रही कि अंग्रेजी का ज्ञान एक प्रभावी नौकरशाह बनने के लिए आवश्यक है।
अंग्रेजी के नंबरों को हटाने की जगह सरकार को अंग्रेजी की फ्री कोचिंग दे कर उनके कांप्रिहेंसन लेवल को बढ़ाने के आइडिया पर काम करना चाहिए था।
समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता का कहना है कि एप्टिट्युड टेस्ट हमें ऐसे सिविल सर्वेंट को चुनने में मदद करता है जो विचारवान हों, जिनमें विश्लेषण की क्षमता हो और जो चुनौतिपूर्ण निर्णय ले सकें। सी सैट उनकी इंटैलिजेंस और अवेरनेस को जज करने का अच्छा माध्यम है, जो कि किसी भी योग्य आईएएस अधिकारी के लिए जरूरी है।
'बिहार चुनाव को रखा गया है ध्यान'
अंग्रेजी जानने का मतलब ये नहीं है कि उनसे मिल्टन या शेक्सपियर के बारे में पूछा जा रहा है, बल्कि इसका मकसद भाषा की वो तकनीकी समझ विकसित करना है जो अंग्रेजी में संचार करने में मदद कर सके। आज अंग्रेजी एक अन्य भारतीय भाषा बन चुकी है।
पूर्व गृह सचिव जी के पिल्लई ने कहा कि ऐसा लगता है कि सरकार का ये फैसला बिहार में होने वाले चुनावों को ध्यान में रख कर लिया गया है। किसी भी सिविल सर्वेंट को एनेलेटिक्स और नंबर्स से डरना नहीं चाहिए।
एक अधिकारी के तौर पर उसे बांध की ऊंचाई या किसी पुल की लोकेशन का फैसला करने के लिए इसकी जरूरत पड़ती है। मुझे लगता है कि सरकार के इस फैसले से इंजिनियरिंग और साइंस के स्टूडेंट्स के साथ न्याय नहीं होगा।
'हमें चाहिए सबसे योग्य उम्मीदवार'
नरेश चंद्रा ने इस ओर भी इशारा किया कि सरकार के इस कदम से यूपीएससी की स्वायत्ता भी प्रभावित हुई है। इस विषय पर अंतिम फैसला यूपीएससी को ही करना चाहिए था, आखिर वह एक संवैधानिक संस्था है। पॉलिसी रिसर्च में सीनियर फेलो डी श्याम बाबू के मुताबिक अखिल भारतीय स्तर की नौकरी में किसी अधिकारी के लिए अपनी लोकल लैंग्वेज के साथ अंग्रेजी का ज्ञान उसे और भी प्रभावी बनाता है।
पूर्व इलेक्शन कमीश्नर एन गोपालास्वामी का कहना है कि अंग्रेजी की अनिवार्यता का सवाल उचित नहीं है क्योंकि ये उन बच्चों के लिए बेहतर नहीं है जो क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़े हुए हैं। अगर अंग्रेजी इतनी ही जरूरी है तो इसे सलेक्शन के बाद भी सिखाया जा सकता है।
हालांकि, दीपांकर गुप्ता का कहना है कि हमें ये स्पष्ट कर लेना चाहिए कि हमें किस प्रकार के सिविल सर्वेंट चाहिए। हमें सबसे योग्य उम्मीदवार चाहिए या हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए जहां सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व हो।
आंकड़े क्या कहते हैं
गौरतलब है कि आंदोलनकारी छात्रों ने ये दिखाने की कोशिश की है कि कैसे 2011 में सी सैट के लागू होने के बाद से हिंदी माध्यम के छात्रों की संख्या में कमी आई है। लेकिन परीक्षा की क्लोजर एग्जामिनेशन रिपोर्ट दूसरी ही कहानी बयां करती है।
आंकड़े बताते हैं कि सी सैट लागू होने से पहले 2010 में भी हिंदी माध्यम छात्रों की संख्या बेहद कम थी।
डेटा के मुताबिक 2011 में हिंदी माध्यम के छात्रों की संख्या में आई कमी के बावजूद 2012 में यह संख्या बढ़ी। जहां 2011 में केवल 1700 छात्र प्रारंभिक परीक्षा में सफल हुए थे वहीं 2012 में यह संख्या 1976 हो गई।