प्रदूषण मामले में दाखिल जनहित याचिका पर सुप्रीम कहा है कि लोग पटाखे न चलाने की बात करते हैं, पराली न जलाने की बात करते हैं लेकिन कोई वाहनों से होने वाले प्रदूषण की बात नहीं करता। सार्वजनिक और निजी वाहनों से होने वाले प्रदूषण का प्रभाव न सिर्फ दिल्ली-एनसीआर बल्कि पूरे देश पर है। इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) एसए बोबडे ने इच्छा जताई कि केंद्रीय परिवहन मंत्री प्रदूषण रोकने के लिए उपायों की जानकारी कोर्ट को दें।
सीजेआई बोबडे ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एएनएस नादकर्णी से पूछा, क्या केंद्रीय मंत्री चर्चा के लिए आ सकते हैं? सीजेआई ने कहा, हम ई-वाहनों की खरीद व चार्जिंग से संबंधित आधारभूत सुविधाओं की व्यवस्था को लेकर परिवहन मंत्री (नितिन गडकरी) से बातचीत की इच्छा रखते हैं। आपके मंत्री इस मुद्दे पर बात कर रहे हैं। हम उनका पक्ष सुनना चाहते हैं।
इस पर नादकर्णी ने कहा, अगर कोर्ट ऐसा आदेश देता है तो उसका राजनीतिक इस्तेमाल हो सकता है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि नेताओं के कोर्ट के सामने पेश होने में कुछ गलत नहीं है। इस पर पीठ ने कहा, हम समझते हैं कि याचिकाकर्ता एनजीओ सीपीआईएल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण राजनीतिक व्यक्ति हैं, लेकिन वह इस पर मंत्री से जिरह नहीं करेंगे। दरअसल, इस याचिका में नीति आयोग द्वारा तैयार 2012 इलेक्ट्रिक वाहन नीति के अनुपालन करने की मांग की गई है।
उनसे बात करेंगे जिन्हें फैसले लेने का हक
पीठ ने कहा, यह मसला पटाखे चलाने और पराली जलाने सहित अन्य मुद्दों से जुड़ा है। लोग पटाखे के खिलाफ जा रहे है, जो वर्ष में एक बार होता है लेकिन वाहनों से प्रदूषण नियमित है। कोई इसकी बात नहीं करता। इसका उपाय जरूरी है। हम ई-वाहनों पर उन अथॉरिटी से मिलकर विचार करेंगे, जिन्हें फैसले लेने का अधिकार है। अब इस मामले पर सुनवाई चार हफ्ते बाद होगी।